चलते समय

तुम मुझे पूछते हो ‘जाऊं?
मैं क्या जवाब दूं तुम्हीं कहो!
‘जा…’ कहते रुकती है जबान
किस मुंह से तुमसे कहूं रहो!

सेवा करना था जहां मुझे
कुछ भक्ति भाव दरसाना था
उन कृपा-कटाक्षों का बदला
बलि होकर जहाँ चुकाना था

मैं सदा रूठती ही आयी
प्रिय तुम्हें न मैंने पहचाना
वह मान बाण सा चुभता है
अब देख तुम्हारा यह जाना

सुभद्राकुमारी चौहान
ये राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रही हैं, इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को कहानी में भी व्यक्त किया।