आप बूढ़े कब होते हैं?

यह बड़ा अजीब सा प्रश्न है कि आप बूढ़े कब होते हैं (This is a very strange question, when do you get old?)? अक्सर इस संदर्भ में लोग यही कहना चाहेंगे कि यह कैसा बेतुका सवाल है। जाहिर-सी बात है बढ़ती उम्र, मानचित्र पर खींची आड़ी तिरछी रेखाओं-सी चेहरे पर उभरती झुर्रियां, खेतों में पकी फसल जैसे पके सफेद बाल, ग्राफ के धरातल पर उभरे वक्र की तरह झुकती सी कमर और इस कमर के वक्र को सहारा देती हाथ में नब्बे डिग्री की छड़ी। मोटे तौर पर यही तो है बुढ़ापा।


यदि बुढ़ापे के कुछ लक्षण बच गए हैं, तो वह भी जान लीजिए। अगर आंखों पर काला मोटे से फ्रेम वाला चश्मा लग जाए या दांतों के बीच उभरी खिड़कियों से झांकती जीभ नजर आए। अगर मुंह से लड़खड़ाते शब्दों के साथ निकलती अधकही बात का एहसास हो तो ये वे पुख्ता निशानियां हैं, जिनसे लोग बूढ़ा लगने या महसूस करने लगते हैं। आज तक हम लोगों ने ये ही लक्षण देखी या कहीं सुनी-पढ़ी हैं।

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लेकिन मेरा प्रश्न फिर वही उभरता है कि आपके सामने आखिर इंसान कब बूढ़ा होता है? मैं बताती हूं इंसान बूढ़ा होता है अपने विचारों से, अपनी कल्पना से, अपने जज्बातों से, अपने परिवेश से, अपने हौसलों से, इंसान बूढ़ा होता है अपनी मानसिकता से, अपने आलस्य से, अपने अविश्वास से, अपनी अधीरता से, अपनो के व्यवहार से, परंपराओं और बोझिल मन से। यदि इंसान चाहे तो अपने आपको सदा बच्चा अथवा जवान रख सकता है। लेकिन ऐसा तभी संभव है जब जीने की ललक, उम्दा हौसले, साहस, अटूट आत्मविश्वास, बढ़ती उम्र के साथ सीखने की क्रिया को बनाए रखने वाली भावनाएं बनी रहें। दरअसल कभी स्वयं को बूढ़ा और कमजोर न समझना, नकारात्मक सोचने वालों से कोसों दूर रहना, शरीर में घर कर चुकी बीमारियों की चिंता कभी न करना जरूरी है। हो सके तो योग करें, स्वयं का विश्वास जागृत रखें, दिनचर्या बदलें। जीवन के जो सपने अधूरे रह गए थे उन्हें पूरा करने का प्रयास करें। अब तक सिर्फ घर, परिवार, बच्चों, समाज के लिए जिए हो तो अब अपने लिए जिएं।

कोई क्या कहेगा? इसकी चिंता कतई न करें। समस्याओं में उलझने की जगह उम्र के अनुभवों से उसे हल करने का प्रयास करें। अच्छी किताबें पढ़ें। अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को शब्दबद्ध करने अथवा करवाने का प्रयास करें। बच्चों के साथ बच्चा बन अपने बचपन का रस लेने का प्रयास करें, बच्चों से पीछा न छुड़ाएं बल्कि उनसे अपडेट होना सीखें।


यह भी जरूरी है कि भूत और वर्तमान की पीढ़ी की तुलना न करें, स्वयं जियो और जीने दो की रीति – नीति को अपनाने का प्रयास करें, ऐसी ही अनेक छोटी-छोटी बातें हैं जो शायद इंसान को कभी बूढ़ा ही न होने दे।
-डॉ. पूजा अलापुरिया