कविता : मैं क्यों पूछूं

मैं क्यों पूछूं यह विरह-निशा,
कितनी बीती क्या शेष रही?

उर का दीपक चिर, स्नेह अतल,
सुधि-लौ शत झंझा में निश्चल,
सुख से भीनी दुःख से गीली
वर्ती सी साँस अशेष रही!

निश्वासहीन-सा जग सोता,
शृंगार-शून्य अम्बर रोता,
तब मेरी उजली मूक व्यथा,
किरणों के खोले केश रही!

विद्युत् घन में बुझने आती,
ज्वाला सागर में घुल जाती,
मैं अपने आँसू बुझ घुल,
में देती आलोक विशेष रही!

जो ज्वारों में पल कर न बहें
अंगार चुगें जलजात रहें,
मैं गत आगत के चिर संगी
सपनों का कर उन्मेष रही!

महादेवी वर्मा

कवयित्री ​परिचय:

हिन्दी साहित्य में छायावादी युग की प्रमुख स्तम्भ मानी जाने वाली कवयित्री महादेवी वर्मा की कविताओं में विरह, दर्द और स्त्री के दुख के कई मिलते हैं। उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। कवि निराला ने उन्हें हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती भी कहा है।