रक्षा व‍िज्ञान और तकनीक‍ि : बंदूक के परीक्षण

बंदूक के अभिकल्पन (Design) और निर्माण में कई प्रकार के विश्लेषणों का सहारा लिया जाता है, पर फिर भी अनुरूपण (Simulation) और प्रारूपण (Modeling) द्वारा इनकी क्षमता का पूरा आकलन संभव नहीं है। इसके लिए निर्माण कर इनका प्रायोगिक (Practical) क्षमता (Performance) प्रदर्शन और सत्यापन जरुरी हो जाता है। प्रायोगिक प्रदर्शन द्वारा न केवल क्षमता का आकलन होता है, बल्कि इससे सुरक्षा, सटीकता (Accuracy), क्षमता-विचलन (Deviation), निर्माण की चुनौतियों का मापन आदि के बारे में भी वास्तविक जानकारी मिलती है। इसलिए अभिकल्पन से निर्माण और प्रयोग तक बंदूक का लगातार परीक्षण होता रहता है। यहाँ तक कि जब वृहत स्तर पर इनका उत्पादन होता है तब भी इसके नमूने की जांच की जाती है। इन परीक्षणों में मुख्यत: क्षमता, सुरक्षा, विचलन से सम्बंधित प्रयोग होते हैं।

नई बंदूक के लिए परीक्षण

जब भी एक नए बंदूक की परिकल्पना की जाती है, तो उसकी कुछ विशिष्टताएं (Specification) तय की जाती हैं। बंदूक व्यक्तिगत हथियार के तौर पर इस्तेमाल होते है, इसलिए इसका हल्का (Light weight) होना, सुरक्षित होना, सुसंगता (Compatible) होना, चलाने में सरल (Simple, easy) होना, और छोटा होना बहुत ही जरुरी है। सामान्यत: बंदूकों के लिए 3 किलोग्राम की वजन सीमा निर्धारित की जाती है। सुरक्षित बनाने के लिए इसे असमय, बिना आवश्यकता के न चलने के लिए अभिकल्पित किया जाता है। अर्थात इसमें कोई वास्तविक ताला बंदी की तरह की व्यवस्था की जाती है, कि उस परिस्थिति में घोड़ा (Trigger) दबाने पर भी ये नहीं चल पाए। सुसंगत होने के लिए हमेशा इसकी तुलना सैनिकों द्वारा पहले प्रयुक्त हथियारों से की जाती है। चलाने (Firing) की सुविधा, निशाना (aiming) लगाने का प्रावधान, चलाने पर होने वाली आवाज (noise) का आकलन आदि से हरेक नई अभिकल्पना को गुजरना पड़ता है। चलाने में सरलता के लिए एक हाथ से चलाना, निशाना लगाने से दागने के बीच का समय, गोली भरने का समय, प्रति मिनट अधिकतम दागी गई गोली की संख्या आदि ऐसे नियामक हैं, जिनका आकलन बहुत जरुरी है। इसकी नली की लम्बाई कम होनी चाहिए, निशाना लगाने को लगी दूरबीन की लम्बाई भी कम होनी चाहिए आदि। और इन सबकी पूर्ति करते हुए बंदूक को सटीक और भरोसेमंद भी बनाना होता है।

बंदूक और लक्ष्य के परीक्षण

बंदूक का जब प्रयोग किया जाता है तो इसमें कई यांत्रिक कल-पुर्जे एक दूसरे के सापेक्ष गतिमान होते है। उनमें घर्षण (Friction) होता है और स्थान परिवर्तन के कारण वे एक दूसरे के पथ में रुकावट भी पैदा कर सकते हैं। साथ ही बंदूक की गोली बाहर भेजने के लिए बंदूक की नली में बहुत ज्यादा दाब उत्पन्न होता है। इस दाब से बंदूक के कई हिस्से में प्रतिबल (Stress) और तनाव (Tension) उत्पन्न होता है। इनका प्रायोगिक मान भी परीक्षण के दौरान देखा जाता है। केवल दाब ही नहीं, ताप, गोली की गति, और घोड़ा दबाने से गोली निकलने के बीच का समय भी मुख्य नियामक होते हैं, जो बंदूक के प्रदर्शन और क्षमता को दर्शाते है।

बंदूक की गोली का लक्ष्य पर सही स्थान पर आघात और लक्ष्य को पूर्व निर्धारित क्षति पहुंचाने की काबिलियत के लिए अलग परीक्षण किए जाते है। इसके लिए निर्धारित कठोरता और सामर्थ्य वाले हल्के या माइल्ड स्टील (Mild Steel) की प्लेट का प्रयोग लक्ष्य के तौर पर किया जाता है। इसमें लक्ष्य पर पहुंची गोली के वेग मापन, भेदन द्वारा प्राप्त छेद की गहराई, भेदन में गोली का आकार परिवर्तन आदि मुख्य नियामक होते हैं। साथ ही निशाने से आघात स्थल की दूरी से गोली के प्रक्षेप पथ में विचलन का पता चलता है।  लक्ष्य पर गोली की अन्योन्य क्रिया (Interaction) में सबसे बड़ी परेशानी ये है कि विश्व स्तर पर अब तक कोई मानक (Standard) व्यवस्था नहीं तय की जा सकी है, जिससे यह माना जा सके कि गोली ने अपनी गतिज ऊर्जा लक्ष्य को स्थानांतरित कर दी है। वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से यह जटिल है, इसका अनुरूपण और प्रारूपण कठिन है, लक्ष्य निरस्त करने का मापदंड भिन्न भिन्न है, और लक्ष्य को क्षति पहुंचाने का पैमाना भी अज्ञात है। यह बात हमेशा याद रखनी है कि परीक्षण तो स्टील पर होता है, पर वास्तविक लक्ष्य तो मानव शरीर होता है। और जख्म निर्माण और उसका जानलेवा होना स्टील पर किए परीक्षण से अनुमानित करना एक अलग तरह की जटिलता उत्पन्न कर देता है।

बंदूक परीक्षण की विशिष्टताएं

जब भी बंदूक की विशिष्टता निर्धारण की बात आती है, तो व्यक्तिगत हथियार और, लघु हथियार होने के कारण, इसकी मारक क्षमता बहुत कम होती है। 100 से 200 मीटर की मारक दूरी बंदूक के लिए बेहतर मानी जाती है। साथ ही इसमें एक बार में एक (single) गोली और एक साथ बहुत (Burst, Multi-shot) गोली निकालने की सुविधा भी आवश्यक है। केवल इतना ही नहीं जब एक गोली एक बार में निकलती है, तो इसकी मारक क्षमता या उससे कम दूरी पर रखे 100 गुना 100 मिलीमीटर के लक्ष्य में 10 में से 9 गोली लगनी चाहिए। इस परीक्षण में बंदूकची (Operator, Gunner, Firer) का बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान हो जाता है। इसके लिए बंदूक को एक स्थिर सहारे (Fixed Stand) पर लगाकर दागने की व्यवस्था की जाती है। लक्ष्य का आकार, मारक दूरी और गोलियों की संख्या बंदूक पर निर्भर करती है। जब ज्यादा गोलियां एक साथ चलाने का परीक्षण किया जाता है, तो 300 गुना 300 मिलीमीटर के लक्ष्य में 60 प्रतिशत तक गोलियां लगनी चाहिए। सुरक्षा की दृष्टि से यह भी आवश्यक है कि लगातार चलाने वाले परीक्षण में बंदूक बीच में न रुके। इसके लिए 2000 गोलियां दागने में 2 या 3 बार अवरोध (2-3 stoppage in 2000 rounds of firing) के बाद भी परीक्षण सफल माना जाता है। बंदूक की क्षमता के लिए एक मिनट में 500 से 600 गोलियां छोड़ने (Rate of firing) की क्षमता भी एक आवश्यकता मानी जाती है।

बंदूक का वजन और आकार भी इसकी विशिष्टता में शामिल होते हैं। बंदूक की आकृति ऐसी होनी चाहिए कि चलाने में उपभोक्ता या सैनिक को कोई असुविधा न हो। साथ ही सैनिक इसे लादकर घूम सके इसके लिए एक मीटर से ज्यादा लम्बी बंदूक नहीं बनाई जाती है। साथ ही इसकी नली की लम्बाई भी 650 से अधिकतम 800 मिलीमीटर तक ही हो सकती है। बाएँ हाथ और दाएं हाथ से काम करने वाले सैनिक भी एक नवनिर्मित या दी गई बंदूक का एक समान इस्तेमाल करने में समर्थ होने चाहिए। बंदूक के सामने एक बोयानेट (Bayonet) या धारदार हथियार लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए, जिसका प्रयोग सैनिक आपातकाल में कर सके। बंदूक लटकाने के लिए बेल्ट, गोली या मैगेजीन भरने की सुविधा का आकलन भी किया जाता है। साथ ही बंदूक भरी है या खाली, इसमें कितनी गोलियां है, ये भी सैनिक को पता लगना चाहिए।

बंदूक को कई अन्य प्रकार के परीक्षणों से भी गुजरना पड़ता है। इसे -20 डिग्री सेल्सियस से +55 डिग्री सेल्सियस तक एक ही दक्षता से काम करना चाहिए। साथ ही गिरने के बाद भी इसका प्रदर्शन प्रभावित नहीं होना चाहिए, पर इसके लिए एक ऊँचाई (एक से दो मीटर) तक निर्धारित की जाती है। छोटे मोटे मरम्मत, या कार्यशाला में कुछ सुधार करने का प्रावधान भी बंदूक के सुचारू रूप से काम करने के लिए एक शर्त हो सकती है। बंदूक को साफ़ करने, नली बदलने आदि का काम अगर सैनिक खुद कर पाए, तो बंदूक को विभिन्न विशिष्टताओं पर खडा माना जा सकता है।

धन्यवाद।

डॉ हिमांशु शेखर

एक वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं, एक अभियंता हैं, प्राक्षेपिकी एवं संरचनात्मक दृढ़ता के विशेषज्ञ हैं, प्रारूपण और संरूपण के अच्छे जानकार हैं, युवा वैज्ञानिक पुरस्कार से सम्मानित हैं, गणित में गहरी अभिरुचि रखते हैं, ज्ञान वितरण में रूचि रखते हैं, एक प्रख्यात हिंदी प्रेमी हैं, हिंदी में 13 पुस्तकों के लेखक हैं, एक  ई – पत्रिका का संपादन भी कर रहे हैं, राजभाषा पुस्तक पुरस्कार से सम्मानित हैं, हिंदी में कवितायेँ और तकनीकी लेखन भी करते हैं, रक्षा अनुसंधान में रूचि रखते हैं, IIT कानपुर और MIT मुजफ्फरपुर के विद्यार्थी रहें हैं, बैडमिन्टन खेलते हैं।