वृक्षों का आदर करना भारतीय संस्कृति का अहम अंग

संजय सिंह
Bhadohi.
भारतीय संस्कृति में सुंदरता के प्रति जितना आदर और आकर्षण है, वह किसी से छिपा नहीं है। मनुष्य प्रकृति का पुत्र है, जिसमें आकाश को पिता व धरती को माता के रूप में पूजा जाता है। अत: माता-पिता को प्रदूषित करने का विचार ही हमारी संस्कृति के विरुद्ध है। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक अशोक कुमार ने लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरुक करते हुए पौधरोपण का अभियान अनवरत जारी रखा है।

अशोक कुमार ने कहा कि हमारा अस्तित्व पंचतत्वों से माना गया है। पंचतत्वों में एक भी तत्व के प्रदूषित होने पर हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। हमारी संस्कृति ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ में विश्वास रखती है। वायु प्राणदायिनी है। हमारी संस्कृति में पर्वत, वृक्ष और नदी से लेकर मिट्टी तक की पूजा की जाती है। मनुष्य के हस्तक्षेप से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है।

कहा कि इसके फलस्वरूप हमें प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है। कभी बाढ़, भूकंप, सूखा तो कभी कोरोना महामारी के रूप में। प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए हम सभी को धरा की सुंदरता को बनाए रखने के लिए अनवरत पौधरोपण करते रहना होगा। अशोक कुमार द्वारा एक अक्टूबर 2017 से अनवरत पौधरोपण का कार्य किया जा रहा है। नौ जून को उन्होंने हास्टल परिसर में अपने मित्र ऋषभ मिश्र के साथ पीपल का पौधा लगाया।