कव‍िता : देश की माटी देश का जल

देश की माटी देश का जल
हवा देश की देश के फल
सरस बनें प्रभु सरस बने
देश के घर और देश के घाट
देश के वन और देश के बाट
सरल बनें प्रभु सरल प्रभु
देश के तन और देश के मन
देश के घर के भाई -बहन
विमल बनें प्रभु विमल बनें


रवीन्द्रनाथ ठाकुर

अनुवाद : भवानीप्रसाद मिश्र