अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस : कैसे क‍िया जाए आदर्श परिवार का निर्माण

“आप अपना परिवार कब शुरू कर रहे हैं?” यह सवाल अक्सर हमारे समाज में हर नवविवाहित जोड़े से पूछा जाता है। और ऐसा क्यों न हो? समाज में किसी भी दंपत्ति को बच्चे के जन्म के बाद ही “परिवार” की उपाधि से नवाजा जाता है। आइए इस अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस पर हम समझें कि अपने समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्था “परिवार” की नींव हम कैसे रखते हैं?

भारतीय संस्कृति में परंपरागत रूप से प्रसव को किसी आध्यात्मिक कार्य से कम नहीं माना गया है। इसमें एक नवजात शिशु के जन्म को तैयार युगल से यह अपेक्षा की जाती है कि वे एक स्वस्थ, सुंदर और सर्वगुण संपन्न बच्चे को जन्म देने के इरादे से शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि की एक निर्धारित प्रक्रिया से गुजरें। इस विषय पर परिवार में बुजुर्गों की स्पष्ट भूमिकाएं और जिम्मेदारियां थीं। वे सामूहिक रूप से अनुष्ठानों जैसे गर्भ धारण, गोद भराई आदि में भाग लिया करते थे। जिसका उद्देश्य गर्भवती मां को तनाव मुक्त वातावरण प्रदान करना था। 

तनाव व च‍िंता से गर्भ के श‍िशु को पहुंचती है हान‍ि

दुर्भाग्य से आधुनिक शहरी विवाहित युगल इन पारंपरिक प्रथाओं और परंपराओं से वंचित रहते हैं। परिवार की शुरूआत के बारे में प्राचीन पारिवारिक ज्ञान जो घर के बुजुर्गों से मिलता था, वह अब इंटरनेट और गूगल पर मिलने वाली सूचना पर निर्भर हो गया है। आधुनिकता की अंधी दौड़ और उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में व्यस्त युवा पीढ़ी में आज अधिकांश गर्भधारण या तो देरी से होते हैं या अनचाहे और आकस्मिक होते हैं। नव दंपत्ति को ईश्वरीय इच्छा की इस अनचाहे गर्भ रूपी “दुर्घटना” को स्वीकार करने के लिए बहुत साहस की आवश्यकता होती है। एक एकल परिवार की स्थापना में प्रत्यक्ष पारिवारिक समर्थन की कमी, हार्मोन में बदलाव के साथ आज के प्रतिस्पर्धी माहौल के कारण अत्यधिक काम का दबाव जैसे कारक न में बदलाव के साथ आज के प्रतिस्पर्धी माहौल के कारण अत्यधिक काम का दबाव जैसे कारक गर्भवती होने वाली विवाहिताओं के लिए एक घातक कॉकटेल साबित होते हैं। इसके परिणामस्वरूप होने वाले भारी तनाव के कारण, शांति और आनंद के स्थान पर रहने के बजाय, आज की इस नए जमाने की माताओं को हर पग पर संघर्ष करना पड़ता है। हालांकि गर्भवती महिलाओं के लिए अच्छा और पौष्टिक खाने, व्यायाम करने, आध्यात्म और ध्यान के लिए भी प्रयास किए जाते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि तनाव और चिंता से भरे वातावरण में गर्भ में पल रहे बच्चे का विकास बुरी तरह प्रभावित होता है।

असावधानी से करोड़ों बच्‍चों का जीवन संकट में

वैश्विक स्तर पर किए अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि हर साल लगभग डेढ़ करोड़ बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं और लगभग अस्सी लाख बच्चे गंभीर जन्म दोषों के साथ पैदा होते हैं। आज केवल 41% बच्चे ही जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कर पाते हैं, जिसे नवजात शिशु के सम्पूर्ण विकास के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। आज भारत में लगभग 55.7% महिलाएं गर्भावस्था में होने वाले बुरे अनुभवों की आशंका में मानसिक रूप से तनावग्रस्त रहती है।

वर्तमान में नवजात शिशुओं में भी मानसिक, व्यवहारिक और शारीरिक विकारता में खतरनाक वृद्धि देखी जा रही हैं। डिस्लेक्सिया या डिसग्राफिया जैसे विकार जो पहले कभी कभी सुनाई पड़ते थे, आज असामान्य नहीं रहे हैं। छोटे बच्चों में सीखने की क्षमता में कमी का होना, जो कुछ दशक पहले तक नहीं के बराबर था,  आज लगभग 10 से 12% तक छोटे बच्चे इससे ग्रस्त हैं। इसका सीधा-सा तात्पर्य यह है कि प्रत्येक भारतीय कक्षा में कम-से-कम 4 छात्र सीखने के लिए संघर्ष करते हैं। यह एक चौंका देने वाला लेकिन आधुनिक जीवन शैली से संबंधित एक कड़वा सत्य है, जिसे हमें न चाहते हुए भी स्वीकारना होगा।

माता-पिता ही बच्चों के आनुवंशिक इंजीनियर

अधिकांश माता-पिता आज मानते हैं कि या तो नियति या जीन उनके बच्चों के जीवन का भविष्य निर्धारण करते हैं। अगर आप भी इस श्रेणी में हैं, तो आपको इस सोच को बदलना होगा। नवीनतम वैज्ञानिक शोधों ने साबित कर दिया है कि “माता-पिता ही अपने बच्चों के असली आनुवंशिक इंजीनियर हैं”। विश्व प्रसिद्ध कोशिका जीव विज्ञानी ब्रूस लिप्टन के शब्दों में “मातृ भावनाएं चाहे वो चिंता या क्रोध के रूप में या इसके विपरीत प्रेम और आशा के रूप में गर्भाशय में बच्चे के आनुवंशिक कोड के चयन और निर्धारण को जैव रासायनिक रूप से प्रभावित करती हैं। इसका मतलब है कि मां के गर्भ में बच्चे का भाग्य सक्रिय रूप से आकार ले रहा है।

गर्भावस्था के दौरान मां का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बच्चे के व्यक्तित्व पर एक अमिट छाप छोड़ता है। दिलचस्प है ना? पर यह एक सच्चाई है, गर्भावस्था के समय मां एक देवी की तरह अपने होने वाले बच्चे और अपने परिवार, समाज और मानवता के भविष्य का निर्धारण करती हैं। हालांकि पश्चिम विश्व इस शोध पर चकित हो सकता है, पर एक भारतीय के रूप में, क्या हम इन तथ्यों को युगों से नहीं जानते हैं? हम सभी ने अपने दादा-दादी को यह कहते सुना है कि “खुश माताएं खुश बच्चें बनाती हैं”। हमारा प्राचीन ज्ञान कहता है- “नियति नहीं, बल्कि ये माता-पिता ही हैं, जो अपनी संतान के भविष्य के लिए जिम्मेदार हैं।”

गर्भ में सीखते हैं बच्‍चे

सांस्कृतिक रूप से, अभिमन्यु की कहानी के बारे में हम सब जानते हैं कि कैसे उसने अपनी मां के गर्भ में ही चक्रव्यूह को भेदने की कला सीखी। हम यह भी जानते हैं कि कैसे मां जीजाबाई ने अपने बेटे शिवाजी राजे भोंसले को अपने गर्भ में ही नेतृत्व, राजनीतिक कौशल और रणनीति के लिए प्रशिक्षित किया था, जो आगे चलकर सबसे महान मराठा नेता साबित हुए। खुशी की बात यह है कि आज समूचा विश्व आखिरकार गर्भावस्था के दौरान पालन-पोषण की अहमियत को समझ गया है। यूनिसेफ, विश्व बैंक और अन्य वैश्विक संस्थाओं ने इस विज्ञान को अब सामूहिक रूप से स्वीकार किया है। इसके अलावा प्रारंभिक बचपन विकास और पोषण की साल 2018 की रिपोर्ट में भी माना गया है कि गर्भावस्था का समय शिशु के स्वास्थ्य, सीखने और उत्पादकता के साथ-साथ सामाजिक और भावनात्मक भलाई को प्रभावित करता है और यह प्रभाव शिशु के बचपन, किशोरावस्था और वयस्क काल तक रहता है।

आज के आधुनिकतम विज्ञान जैसे तंत्रिका विज्ञान, विकासात्मक मनोविज्ञान आदि भी गर्भ विज्ञान के हमारे प्राचीन ज्ञान के निष्कर्षों को साबित कर रहे हैं। विज्ञान आज इस बात से पूर्ण सहमत है कि गर्भावस्था से पहले माता-पिता के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हो जाने पर समय से पहले प्रसव, जन्म दोष और अन्य जन्म संबंधी विकारों की संभावना कम हो जाती है। वास्तव में, ऐसी तैयारी एक बच्चे के स्वास्थ्य और विकास को बढ़ाने में मदद करती है। विज्ञान मानता है कि मां के गर्भ में पल रहे बच्चे संवेदनशील प्राणी होते हैं जो सोचने, महसूस करने और अनुभव करने के जटिल कार्यों में सक्षम होते हैं। साथ ही गर्भावस्था और शैशवावस्था की प्रारंभिक अवधि के दौरान दी गई देखभाल एक बच्चे को अपनी उच्चतम क्षमता का उपयोग करने में सक्षम बना सकती है, और बचपन में पैदा की गई इन क्षमताओं का मानव विकास पर एक सार्थक पीढ़ीगत प्रभाव पड़ता है।

कहानी की शुरुआत बदलने का सही समय

इसलिए इस अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस पर, मैं आप सभी भावी माता पिताओं से गर्भावस्था के समय पूरी तरह सचेत रहकर होने वाले बच्चे के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक कल्याण के लिए एक उत्तम वातावरण प्रदान करने और गर्भ में उसके समग्र पालन-पोषण करने का प्रयास करने का आग्रह करती हूं। साथ ही प्राचीन भारतीय ज्ञान की अपार शक्ति और आधुनिक वैज्ञानिक के निष्कर्षों के साथ माता-पिता के रूप में, आप सभी से, न केवल अपने बच्चे के भाग्य को सचेत कार्यों के साथ बल्कि अपने परिवार और विशेष रूप से समाज के भविष्य को भी लिखने का अनुरोध करती हूं। आप इस बात से सहमत होंगे कि अगर हम कहानी की शुरुआत बदलते हैं, तो हम पूरी कहानी बदल देते हैं और आज ही इस कहानी की शुरुआत बदलने का सही समय है। आप सभी को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं

हरलीन कालिया

लेख‍िका एक गर्भावस्था कोच हैं। माई सुपर बेबी इनिशिएटिव की संस्थापक होने के साथ ही वे शिक्षक, लेखक और योग प्रशिक्षक हैं।

इनसे — Thesuperbabyprogram@gmail.com

पर संपर्क किया जा सकता है