मुकुल राॅय की टीएमसी में ‘घर’ वापसी : अब नया खेला होबे

तेरा जाना… बीजेपी के अरमानों का धुल जाना

टीएमसी के दफ्तर में भाजपा उपाध्यक्ष मुकुल राय और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की बैठक के पश्चात मुकुल राॅय की घर वापसी हो गयी है। इस घर वापसी पर ममता बनर्जी ने कहा है कि, “घर का लड़का लौट कर घर आया है।” मुकुल राॅय नवंबर, 2017 से पूर्व टीएमसी में थे और उनकी स्थिति ममता बनर्जी के पश्चात पार्टी में नंबर 2 की थी। बीजेपी ने उन्हें टीएमसी से तोड़कर पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए एक बड़ा दांव खेला था और उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था। मुकुल राॅय ने भी समय के साथ पश्चिम बंगाल में बीजेपी को खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और टीएमसी के अधिकांश जो विधायक और नेता टूट कर के भाजपा में आए थे उसमें मुकुल राॅय की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसका लाभ बीजेपी को 2019 के लोकसभा चुनाव में भी मिला था। जहां 2014 में बीजेपी के पश्चिम बंगाल से लोकसभा में दो सांसद थे वहीं 2019 में इन सांसदों की संख्या 18 तक पहुंच गयी।


ममता बनर्जी ने सभी के लिए घर वापसी के रास्ते खोलें…

इस वापसी के साथ ही यह अब माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रहने वाली है क्योंकि मुकुल राॅय के टीएमसी में वापस आने के साथ ही यह माना जा रहा है कि लगभग 35 से अधिक बीजेपी विधायक और वह सभी नेता जो विधानसभा चुनाव पूर्व टीएमसी छोड़कर भाजपा में चले गए थे उनकी भी घर वापसी के लिए रास्ते खोल दिए गए हैं। मुकुल राय के टीएमसी में घर वापसी के कई मायने निकलते हैं ।

इससे बीजेपी होगी कमजोर

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां विधानसभा के पटल से पूरी तरह से समाप्त हो चुकी हैं और इसके परिणाम स्वरूप पश्चिम बंगाल में मुख्य लड़ाई टीएमसी और भाजपा के बीच ही है। ऐसी स्थिति में यदि मुकुल राय सहित अन्य नेताओं के घर वापसी होती हैं तो बीजेपी कमजोर होगी और उसी अनुपात में टीएमसी मजबूत होगी।

यह बीजेपी की जोड़-तोड़ की राजनीति पर होगा कुठाराघात

यह भी देखना होगा कि बीजेपी जिस तरह से जोड़-तोड़ की राजनीति के माध्यम से पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने का स्वप्न देख रही थी उसकी यह राजनीति भी असफल होती दिखाई दे रही है और उसकी इस राजनीति से जनता भी भलीभांति परिचित हो गई है। इसका असर उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी देखा जा सकता है क्योंकि उत्तर प्रदेश के चुनाव नजदीक आते ही भाजपा पुनः जोड़-तोड़ की राजनीति में सक्रिय हो गयी है।

इससे बीजेपी के ‘कैडर-बेस्ड’ पार्टी के तगमे को लगा झटका

बीजेपी अब तक यह कहती आई है कि वह ‘कैडर-बेस्ड’ पार्टी है और ‘कैडर-बेस्ड’ पार्टी में कार्यकर्ता नीचे से ऊपर की ओर जाता है। लेकिन जिस तरह से पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी में पैराशूट से नेता लांच किए गए और उन्हें टिकट दिया गया इसके कारण से बीजेपी के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में भी नाराजगी थी और इस नाराजगी के कारण भी बीजेपी को नुकसान हुआ था। दूसरी तरफ बाहर से आए नेताओं को न तो बीजेपी के कैडर नेताओं ने स्वीकार किया और दूसरी तरफ टीएमसी से बीजेपी में आए नेताओं का भी बीजेपी कैडर के साथ लगाव नहीं जुड़ पाया था और पार्टी दो भाग में बंट गयी थी। इसके कारण से वह भी बीजेपी में रहते हुए भी स्वयं को अलग-थलग महसूस कर रहे थे। चुनाव हारने के पश्चात इन नेताओं की बीजेपी ने भी बहुत अधिक अनदेखी की जिसकी वजह से यह नेता अंदर ही अंदर घुट रहे थे और इसलिए वह वापसी के लिए आतुर थे जिसकी शुरुआत मुकुल राॅय से हो रही है। इस घटनाक्रम से न केवल बीजेपी के ‘कैडर-बेस्ड’ होने वाले तमगे को चोट पहुंची है बल्कि इससे बीजेपी भविष्य में पश्चिम बंगाल में और भी कमजोर होती चली जाएगी।

आने वाले चुनाव पर भी होगा असर

इसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव और 2026 के विधानसभा के चुनाव पर भी देखा जाएगा। जिस प्रकार बीजेपी के ‘धुआंधार’ प्रचार के बावजूद टीएमसी ने विधानसभा चुनाव में 200 से अधिक सीटें जीती हैं और मुकुल राय के घर वापसी होती है तो इसका असर निश्चित रूप से टीएमसी की मजबूती पर पड़ेगा। इसी तरह देखा जाए तो ममता बनर्जी ने 2026 के विधानसभा के चुनाव की तैयारी भी अभी से शुरू कर दी है, और वह इस स्थिति को बनाए रखती हैं तो 2026 में भी ममता बनर्जी को हराना बीजेपी के लिए बहुत कठिन होगा।

कौन है मुकुल राॅय

67 वर्षीय मुकुल राय पश्चिम बंगाल के कद्दावर नेता है। वह कभी ममता बनर्जी के अत्यंत नजदीकी हुआ करते थे और उनकी स्थिति टीएमसी में नंबर दो की थी। वह टीएमसी के संगठन के सर्वोच्च स्तर से लेकर निचले स्तर तक के कार्यों को संपादित करते थे। वह पूर्व में जहाजरानी मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा केंद्रीय रेल मंत्री भी रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त वह राज्यसभा सदस्य भी रहे हैं तथा वर्तमान समय में वह पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्य हैं।

अनिल सिंह 

निदेशक

Centre for Administration & Governance, 

सिविल सेवा (आईएएस/पीसीएस) 

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