प्रेरक प्रसंग : समय से पहले, क़िस्मत से ज़्यादा

निजामुद्दीन सिद्ध औलिया थे। उनके लाखों प्रशंसक, अनुयायी मुरीद थे। अमीर खुसरो उनके शिष्य थे। वह रात को भेष बदलकर दिल्ली में घूमा करते थे और जनता के दुख-दर्द दूर करते थे। एक रात निजामुद्दीन औलिया भेष बदलकर दिल्ली की गलियों में घूम रहे थे कि एक मकान से उन्हें एक महिला के मधुर भजन गाने की ध्वनि सुनाई दी। भजन इतने मधुर स्वर से गाया जा रहा था कि सूफ़ी संत उस मकान की ओर खिंचे चले गए और मकान के बंद दरवाज़े पर खड़े होकर कान लगाकर भजन सुनने लगे। वह एक वेश्या का कोठा था।गायिका का स्वर इतना दर्द भरा था कि औलिया को लगा कि इस गायिकासे मिलना चाहिए जो इतना डूबकर गा रही है। निजामुद्दीन औलिया ने दरवाज़ा खटखटाया पर किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला। काफ़ी देर जब वह दरवाज़ा खटखटाते ही रहे तो एक महिला बाहर निकली।
वह बोली, ‘बोलिए, क्या चाहिए?’
निजामुद्दीन बाले, ‘आप बहुत मधुर गा रही थीं। आज तक मैंने इतना श्रेष्ठ गायन नहीं सुना। मैं बहुत प्रसन्न हूं। मैं औलिया हूं आज तुम जो चाहो मुझसे मांग लो। मैं ज़रूर दूंगा।’
यह सुनकर महिला ने तत्काल दरवाज़ा बंद कर लिया। निजामुद्दीन ने फिर दरवाज़ा खटखटाया, पर दरवाज़ा नहीं खुला। पर उन्हेंने दरवाज़ा खटखटना चालू रखा।पर दरवाज़ा नहीं खुला। वह वहीं खड़े रहे और दरवाज़ा खटकाते रहे।
भोर पहल, जब चिड़िया चहकने लगीं तो द्वार खुला… भजन गाने वाली महिला बाहर नकली, बोली, ‘मैं वेश्या हूं। अगर आप हमें कुछ देना चाहते हैं, तो समय से पहले क़िस्मत से ज़्यादा कुछ दे सकते हैं तो दे दीजिए।’
यह कहकर उसने दरवाज़ा फिर बंद कर लिया।
महिला के इस जवाब से हजरत निजामुद्दीन सन्न रह गए।
अरे! उन्हें यह भी ज्ञान नहीं रहा कि ख़ुदा, ईश्वर के अलावा कोई संत, औलिया समय से पहले, क़िस्मत से ज़्यादा दे ही नहीं सकता! यह महिला वेश्या होकर भी परम सत्य को जान गई है, जिसको वह ख़ुद भूल गए थे।
उसी समय वह अपने स्थान पर लौट आए और निर्वाण प्राप्त किया।
उनके शिष्यों, मुरीदों में सबसे पहले अमीर खुसरो पहुंचे। हज़रत निजामुद्दीन औलिया को देख, उनके मुंह से स्वर फूट पड़े —

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केश,
चल खुसरो घर आपने, सांझ भई चहु देश।।

दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह है। दिल्ली में उनके ही नाम से एक रेलवे स्टेशन है।