पेट तो हर कोई भर लेता है, किसी के चेहरे पर मुस्‍कान लाए तो बात है…

आज हम आपको म‍िला रहे हैं उत्‍तर प्रदेश के आंबेडकर नगर में रहने वाली पुष्‍पा पाल से ज‍िनकी आंखों में आम युवत‍ियों की तरह ही बेहतर जीवन के सपने थे, कर‍ियर बनाने के ल‍िए सामाज‍िक क्षेत्र में काम करने न‍िकली पुष्‍पा ने जब ग्रामीण जीवन को नजदीक से देखा तो सारे सपने ही बदल गए, अब वे गांव और गांव के लोगों का जीवन बेहतर बनाने में जुटी हुईं हैं। वे कहतीं हैं सच कहूं तो अ‍ब मैं खुद को पहचान नहीं पाती, हर रोज क‍िसी न क‍िसी तरह का कुछ नया जुड़ जाता है मुझमें… रोज सुबह कुछ होकर उठतीं हूं, और सोने से पहले कुछ और हो जातीं हूं, दुन‍िया बहुत व‍िव‍िध है, यहां प्रेम और सकारात्‍मकता की भरमार है, लोग दूसरों के ल‍िए बहुत कुछ करते हैं…

पुष्‍पा कहतीं हैं, ग्रामीण जीवन बहुत कठ‍िन होते हुए भी सरल बना हुआ है। मुझे नहीं पता कि शहरों के लोग क्या सोचते हैं गांवों के विषय में, पर में इतना जरूर जानती हूं कि वे हमारे बारे में बहुत कम जानते हैं। जब भी कोई शहरी किसी गांव में आता है, तो ग्रामीणों का जीवन संघर्ष देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। लोग यहां के लोगों के जीवन को बेहतर करने का संकल्प लेकर वापस जाते हैं, और कुछ ही समय बाद अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाते हैं।

कोरोना में टीम गांवों में फैला रही है जागरुकता

इन द‍िनों पुष्पा और उनकी 37 लोगों की टीम गांव-गांव घूम कर लोगों को कोरोना को लेकर जागरुक कर रहे हैं। पुष्‍पा बतातीं हैं क‍ि गांवों में हुई मौतों से यहां भय का माहौल है। लोग सरकारी आदमी देखते ही गांव छोड़कर भाग रहे हैं। वैक्‍सीन को लेकर तो बहुत ज्‍यादा भ्रम है। ऐसे में हमारे कार्यकर्ता लोगों को समझा कर उनका भय कम कर रहे हैं।

गांवों में व्‍यवस्‍था बनाने का प्रयास

आंबेडकर नगर जिले के अकबरपुर ब्लॉक के ग्राम पंचायत बेवाना की रहने वाली पुष्पा उनके आस-पास के लोगों का जीवन अत्यंत कठिन है, यहां गरीब लोगों के बच्चों को शिक्षा के नाम पर ठगा जा रहा था। लड़कियों की शिक्षा व्यवस्था तो और भी दयनीय थी। ऐसे में कुछ लोगों के साथ मिलकर उन्होंने ‘बेटी पढ़ाओ’ अभियान शुरू किया। इसके तहत ‘जन शिक्षण केंद्र’ नाम की संस्था शुरू की गई और इसी नाम से स्कूल खोला गया। पुष्पा बताती हैं, ‘मैं तब छोटी थी, पर मैं इतना तो समझ ही रही थी कि पापा इस स्कूल खोलने के लिए दिन-रात चिंतित रहते थे। उनका सपना था कि हमारे आस-पास के सभी इलाकों में लड़कियों को समुचित शिक्षा मिल सके। अगर आप गांवों को जानते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि यहां किसी तरह के नए काम को लोग बहुत ही अलग-अलग तरह से लेते हैं, कुछ आपका जोरदार समर्थन करेंगे तो कुछ जोरदार विरोध कई बार विरोध और समर्थन के चक्कर में मूल कार्य रह जाता है। मैंने अपने पिता को लोगों से जूझकर इस स्कूल के सपने को साकार करते देखा था। वे कहते थे, इंसान को अपने से बाहर दूसरों के लिए कुछ करना चाहिए तभी हमारा जीवन सार्थक होगा।’

बेहतर क‍िया ग्रामीण मह‍िलाओं का जीवन

पुष्‍पा पाल (30) के पिता राम बदन पाल ने देखा कि ग्रामीण मानसिकता से जूझते हुए राम बदन पाल ने स्कूल का सपना पूरा किया, तो उनकी नजर ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य पर गई। जब उन्होंने करीब से देखा तो ज्यादातर महिलाएं कुपोषित थीं। उन्होंने इस विषय को हाथ में लिया और कार्य शुरू किया। उनके प्रयासों से 51 पंचायतों में 4 हजार 127 गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल हो सकी। पुष्पा अब बड़ी हो रही थी, वे भी पिता के साथ इस कार्य में लग गई। सब कुछ सही चल रहा था कि तभी राम बदन पाल की मौत हो गई। अब सारी जिम्मेदारी पुष्पा पर आ गई। आत्मविश्वास से भरी पुष्पा किसी शहर में जाकर आराम जिंदगी जी सकती थी। उन्होंने अपने पिता के सपने को जीवन लक्ष्य बनाते हुए ग्रामीण लोगों के जीवन को बेहतर करने का बीड़ा उठाया।

मह‍िलाओं को लड़ना स‍िखाया

पुष्पा बताती है, पिता के जाने के बाद मैं समझ नहीं पा रही थी क‍ि कहां से शुरू कंरू पर पिता के अच्छे कार्यों ने हमारे परिवार के बहुत से शुभचिंतक बना दिए थे, जिन्होंने मुझे मानसिक बल देते हुए पिता के कार्य को आगे बढ़ाने हौसला दिया। मैंने भी तय किया कि में अपने पिता की आशा पर खरी उतरने का प्रयास करूंगी। पुष्पा ने देखा कि प्राइमरी स्कूलों को दशा बहुत ही खराब है, यहां साफ-सफाई और मिड डे मील की दशा बहुत खराब थी। फिर क्या धरना-प्रदर्शन और सरकारी अधिकारियों दफ्तरों के चक्कर लगाने का कष्टप्रद कार्य शुरू हुआ। धमकियों और लालच देने का दौर भी चला, लेकिन पुष्पा अपने निर्णय पर अडिग रहीं और आज 65 मिडिल और 46 प्राइमरी स्कूलों में मिड डे मील की व्यवस्था में भारी सुधार देखा जा रहा है। उन्होंने 60 गांवों के बच्चों का ग्रुप बनाया, जो स्कूल और वहां की व्यवस्था पर ध्यान देते हैं। अगर कहीं से कोई शिकायत मिलती है, तो आज भी इस संस्था के लोग अचानक स्कूलों में पहुंचकर मील की जांच करते हैं। पुष्पा बताती हैं, ‘हमने देखा कि गरीब ग्रामीण महिलाएं रोजगार के लिए तरस रही हैं, उन्हें बहुत कम मजदूरी पर कार्य करना पड़ रहा है, जबकि नरेगा के तहत महिलाओं को काम देने की अनिवार्यता है। हमने इसके खिलाफ आवाज उठानी शुरू की। हमने 40 गांवों की 10 हजार महिलाओं का एक ग्रुप बनाया और ठेकेदारों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। इनमें से 444 महिलाओं को ट्रेनिंग देकर इनका लीडर बनाया, जो हर स्थान पर ठेकेदारों और अधिकारियों से बात करती हैं। पहले तो लोगों ने मना किया पर हमारी एकता के सामने उनकी चालबाजी नहीं चली और आज सभी महिलाओं को उनके अधिकार का काम मिल रहा है। पुष्पा के नेतृत्व में इन महिलाओं ने नरेगा को दरकिनार करके मशीनों से काम करवाने वाले ठेकेदारों का काम रुकवा दिया। कभी घूंघट में रहने वाली ये महिलाएं आज अधिकारियों से लिखित में जवाब मांगती हैं। इसके चलते इस इलाके में धांधली करना अत्यंत कठिन हो चला है। इनके आंदोलन के चलते कई बार पुलिस आई, तो महिलाओं ने नारा दिया, पुलिस से नहीं लड़ाई है, पुलिस हमारा भाई है।

बदल दी ग्रामीण लोगों की मानसि‍कता

पुष्‍पा के प्रयास से नौ गांवों में महिलाओं की स्‍थ‍ित‍ि में बेहतरीन सुधार नजर आ रहे हैं। इसके ल‍िए उन्‍होंने 2016 से इन गांवों में 150 समानता साथी बनाएं हैं। ये समानता साथी मह‍िलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और मह‍िलाओं के स्‍वास्‍थ्‍य खासकर पर‍िवार न‍ियोजन में पुरुषों की भूम‍िका पर जागरुकता ला रहे हैं। वे पुष्‍पा बतातीं हैं क‍ि इसका बहुत ही सकारात्‍मक पर‍िणाम देखने को म‍िल रहा है। कई स्‍थानों पर तो युवक खाने के बाद अपनी थाली खुद धोते हुए कहते म‍िलेंगे क‍ि हमारी बहन ही क्‍यों धोए बर्तन हम क्‍यों नहीं, हर कोई समान है। इसके साथ ही पुष्‍पा चाइल्‍ड फंड इंड‍िया, बार्न फाडेन के साथ म‍िलकर 16 पंचायतों की 1500 महिला क‍िसानों के ल‍िए काम कर रहीं हैं। इसके तहत मह‍िला क‍िसानों को खेती के बारे में जानकारी दी जाती है, वहीं ज‍िनके पास खेत नहीं हैं। उनको व्‍यापार करने में मदद कर रही हैं।

लड़क‍ियों को कुपोषण से बचाया

उन्होंने 5 हजार लड़कियों के स्वास्थ्य की जांच कराई, इनमें से 50 प्रतिशत लड़कियां कुपोषण का शिकार थी। वर्तमान समय में पुष्पा गांव में दवाखाना खोलने में जुटी हुई हैं, एक हजार परिवारों पर एक दवाखाना खोलने की योजना है। वे बताती हैं, ‘मैंने सरकारी विभागों से याचना करके देख लिया कि, यहां के बाबू अपनी मर्जी से ही चलते हैं, यहां कागजों पर सभी का स्वास्थ्य बेहतर ही दिखाया जाता है। ऐसे में मैंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर गांव दवाखाने की योजना बनाई। इसके तहत हम हर परिवार से महीने के 50 रुपए जमा करवा रहे थे। हमारी योजना थी क‍ि हम इस पैसे से डॉक्टर और दवाइयों का इंतजाम करेंगे, पर कोरोना के चलते यह योजना अभी अधर में अटकी पड़ी है। 37 वालेंटियरों के साथ काम करने वाली पुष्पा सुबह 9 बजे घर से निकल जाती हैं और लोगों के जीवन में उजाला लाने का प्रयास करती रहती हैं। आस-पास के इलाकों के लोग अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं को लेकर उनके पास आते हैं, और वे उन्हें हल करने में जुट जाती हैं। वे कहती हैं, ‘मैं गरीब महिलाओं और बच्चों के जीवन में बदलाव लाना चाहती हूं, मुझे कुपोषण से लड़ना है। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं और युवतियां जब तक बेड पर नहीं पड़ती तब तक उन्हें बीमार नहीं माना जाता। उनसे कोई नहीं पूछता कोई दिक्कत तो नहीं है। मैं इस सोच को बदलना चाहती हूं, मेरी सबसे बड़ी लड़ाई यह है कि मैं समाज में महिलाओं को भी इंसान के रूप में पहचान दिला सकूं।  वे कहतीं हैं पेट तो हर कोई भर लेता है, किसी के चेहरे पर मुस्‍कान लाए तो बात है…