आओ जलाएं एक दीपक संकल्प का…

सकारात्मक ऊर्जा और दृढ़ निश्चय की बाती-तेल से रोशन रखना होगा देश के भविष्य का जगमगाता दीया !

आज बाल दिवस है और बड़ा संयोग है कि रोशनी का महापर्व दीपावली भी है। बच्चे जिस तरह से परिवार और समाज में खुशियां और स्नेह बिखेरते हैं, ठीक ऐसे ही दिवाली के दिन खुशियों के दीप भी झिलमिलाते और जगमगाते हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की सोच भी बच्चों के प्रति इसी तरह की थी। उनका मानना था कि बच्चे गुलाब के फूल की पंखुडि़यों की तरह कोमल होते हैं, जो सिर्फ खुशबू फैलाने का काम करते हैं। 

राजेश कसेरा पंडित जवाहर लाल नेहरूपूरे जीवन उन्होंने बच्चों से प्रेम किया। बच्चे हमेशा उनके आसपास रहें, ठीक उसी तरह जैसे उनकी शेरवानी पर गुलाब का फूल रहता था। उनका मानना था कि भविष्य निर्माण में भावी पीढ़ी बहुत मायने रखती है, इसलिए बच्चों के विकास पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। प्रेम और सरलता से भरा उनका स्वभाव बच्चों को बहुत पसंद था, इसलिए वे प्यार से उन्हें ‘चाचा नेहरू’ के नाम से पुकारते थे। बच्चों से विशेष लगाव के कारण ही उनके जन्म दिवस 14 नवंबर को ‘बाल दिवस’ के रूप में मनाते हैं।नेहरू का बच्चों के प्रति लगाव इसलिए खास रहा, क्योंकि वे खुद बचपन से लेकर अंतिम सांस तक एक बच्चे की तरह जिए। उनके मन के एक कोने में नन्हा जवाहर ताउम्र जीवंत रहा। बच्चों के चाचा नेहरू का बचपन भी सामान्य बच्चों की तरह बीता। ऊंची उड़ती रंग−बिरंगी पतंगों को देखकर वे बहुत खुश होते थे। पिता के साथ पतंग उड़ाने का खूब मज़ा लेते थे। उनके पिता जब पतंग को ऊंची उड़ाकर उसकी डोर नन्हे जवाहर के हाथ में थमा देते तो वे श्वास रोककर पतंग थामे रहते। उनके पिता मोतीलाल पेशे से इलाहाबाद के प्रख्यात वकील थे। वे शौकीन मिजाज इंसान थे। घर में ऐशो आराम की कोई कमी नहीं थी। राजकुमारों की तरह पालन पोषण हुआ था बचपन में चाचा नेहरू का। अपने जीवन में धन की कमी न होने के बावजूद उनमें गरीबों के दर्द का अहसास रहा। गरीबी देखकर वे बहुत दुःखी होते थे।

कई बार वे कहते थे, यदि मेरे पास अलादीन का चिराग होता तो मैं एक फूंक मारकर दुनिया से गरीबी दूर कर देता। उनके जन्मदिन पर पिता मोतीलाल कभी गेहूं, चावल, कभी कपड़ों तो कभी मिठाइयों से तौलते और फिर उन चीजों को गरीबों में बांट देते। यह देखकर जवाहर बहुत खुश होते। वे अपने पिता से पूछते कि क्या जन्मदिन साल में कई बार नहीं मनाया जा सकता।भारत की परंपरा रही कि दीपावली पर अपने घर के अलावा पड़ोसी के घर पर भी एक दीपक जरूर जलाएं क्योंकि आपका सुख−चैन पड़ोसी के सुख चैन से पूरी तरह प्रभावित रहता है। यही सोच थी हमारे प्रथम प्रधानमंत्री की। उनका मानना था कि सुख समृद्धि और शांति पर सबका हक है। सिर्फ भारत ही नहीं कोई भी देश गुलाम नहीं होना चाहिए। भारत की आजादी दूसरे देशों की आजादी से समृद्ध होगी दुनिया की अशांति हमें भी शांति नहीं दे सकती। सर्वत्र एकता ही पृथ्वी का स्वर्ग है। यही कारण था कि पाकिस्तान के आक्रमण का विरोध करते हुए आवश्यकता पड़ने पर वे उसके सहयोग के लिए हमेशा तैयार रहे। जब जापान ने एशिया पर हमले किए तो उसके खिलाफ भी उन्होंने आवाज़ उठाई। साथ ही जापानियों पर होने वाले अन्याय का विरोध किया। देश की मिट्टी और देशवासियों से सच्चे प्रेम की बदौलत ही आज भी वे लोगों के आदर्श हैं। उनका भारत की मिट्टी से और यहां के कण−कण से प्रेम ही था कि उन्होंने अपनी वसीयत में इच्छा जाहिर की थी कि मेरी राख को देश के खेतों, पहाड़ों और नदियों में विसर्जित किया जाए ताकि मैं इस देश के कण−कण में व्याप्त रहूं। 

आज चाचा नेहरू होते तो इन हालात को देखकर रोते, कसमसाते या ये हालात पनपने नहीं देते आज देश के बच्चे बेहाल हैं। दिन प्रतिदिन उन पर स्कूलों में शिक्षा का बोझ बढ़ता जा रहा है। खास कर बालिकाओं का हाल तो बेहद चिंताजनक है। ‍उनकी सेहत, कम उम्र में उन पर अत्याचार और उनके साथ हो रही अनैतिक घटनाएं और जन्म से पहले ही उन्हें कोख में मार दिया जाना। ये सबके लिए बेहद चिंता का विषय है। इसके अलावा देश में बाल श्रमिक निरंतर बढ़ रहे हैं। इसका एक कारण महंगाई का बढ़ना भी है, क्योंकि बालक-बालिकाओं की प्राथमिक शिक्षा पूरी होते-होते तमाम बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। ऐसे में गरीब तबके के पालकों के पास देने के लिए स्कूल फीस भी नहीं होती है। ऐसे में चाचा नेहरू का जन्मदिन मनाना सही मायने में तभी सच्चा साबित होगा, जब इन बुराइयों को जड़ से समाप्त किया जाएगा। चाचा नेहरू भी यही चाहते थे ‍कि देश के सभी बच्चे खुशहाल रहें। खूब पढ़े-लिखे, खेले-कूदे और मौज करें और ‍भारत के अच्छे नागरिक बनकर दुनिया में देश की अलग पहचान बनाए। 
बच्चों के लाडले इसलिए बन गए चाचा नेहरू


नेहरू का बच्चों के प्रति प्रेम का एक वाकया है। दिल्ली में तीन मूर्ति भवन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का सरकारी निवास था। एक दिन वे इसके बगीचे में टहल रहे थे। तभी उन्हें छोटे बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने आस-पास देखा तो पेड़ के बीच एक से दो माह का बच्चा रोता दिखाई दिया। उन्होंने मन ही मन सोचा कि इसकी मां कहां होगी? उन्होंने इधर-उधर देखा। वह कहीं भी नजर नहीं आ रही थी। उन्होंने सोचा शायद वह बगीचे में ही कहीं माली के साथ काम कर रही होगी। वे यह सोच ही रहे थे कि बच्चे ने रोना तेज कर दिया। इस पर उन्होंने उस बच्चे को उठाकर अपनी बांहों में लेकर उसे थपकियां दीं, झुलाया तो बच्चा चुप हो गया और मुस्कुराने लगा। बच्चे की मां ने जब प्रधानमंत्री की गोद में अपने बच्चे को देखा तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। बच्चों को लेकर उनकी संवेदनशीलता का यह दृश्य देखकर उस बच्चे की मां भी अवाक रह गई। यही वजह है कि बाल दिवस पर आज भी बच्चे चाचा नेहरू को याद करते हैंएक सवाल, उनके सपनों को क्यों नहीं कर सके साकार


देश के बच्चों के लिए चाचा नेहरू ने सुनहरे भविष्य के जो सपने देखे थे, वे आज भी धूल-धूसरित हो गए हैं। हाल ये हैं कि कारों में घूमते हुए लोग आइसक्रीम खाकर उसमें लिपटा कागज़ फेंकते हैं और उस कागज को लपकने के लिए दर्ज़नों बच्चे स्पर्द्धा करते नज़र आते हैं। जनगणना के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 1991 में बाल मजदूरों की संख्या 1.12 करोड़ थी जो 2001 में बढ़कर 1.25 और 2011 में करीब दो करोड़ हो गई। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग मानता है कि बालश्रम भारत पर काले धब्बे के समान है लेकिन चाचा नेहरू के सपनों को पूरा करने के लिए इस बुराई को पूरी तरह से समाप्त करने और देश के सभी बच्चों को स्कूली शिक्षा के दायरे में लाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं करता। असहाय बच्चों को न्याय दिलाने के मामले में देश का श्रम मंत्रालय भी असरहीन एवं दुर्बल बना हुआ है। ऐसे में आज नेहरू यह सोचने पर मजबूर हो जाते कि आख़िर वह किन बच्चों के चाचा हैं? सिर्फ उनके जो सज-संवर कर स्कूलों में जाकर बाल-दिवस मना सकते हैं या उनके भी जो उन स्कूलों के सामने बैठे जूते गांठा करते हैं। नेहरू को निश्चित ही देश के हर बच्चे की चिंता होती, लेकिन जीवन की मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति के लिए दिन-रात खटती नन्हीं हथेलियों की चिंता में तो वे घुले ही जा रहे होते। उनकी चिंता का एक बड़ा कारण यह भी होता कि आज़ादी की लड़ाई में शामिल रही उनकी कांग्रेस पार्टी के घोषणा-पत्र में कभी बाल दासता से आज़ादी दिलाने का वादा क्यों नहीं किया जाता? 

बाल दासता के शिकार 100 में से 75 बच्चे अल्पसंख्यकों, हरिजन, आदिवासियों और 20 बच्चे अन्य पिछड़ी जातियों के होते हैं। लेकिन सामाजिक न्याय का झंडा बुलंद करने वाले आज के वाम दलों, टीडीपी, डीएमके-एआईडीएमके, सपा-बसपा, राजद-जेडीयू जैसे राजनीतिक दलों के एजेंडे में बाल दासता की समाप्ति और मुक्ति का कोई जिक्र क्यों नहीं होता? नेहरू शायद यह पूछने की हिम्मत भी जुटाते कि अगर बच्चा-बच्चा राम का है, तो सुबह-सवेरे उठकर कचरे के सड़े हुए ढेर से अपने लिए भोजन चुनने पर क्यों मजबूर है?

राजेश कसेरा
वरि‍ष्‍ठ पत्रकार हैं
वि‍गत 17 वर्षों से पत्रकारि‍ता में सक्रि‍य
वि‍विध वि‍षयों पर लेखन  
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