Jain dharm जैन धर्म और संस्‍कार : सकारात्‍मकता ही हमें जीवन को बचाना, बढ़ाना स‍िखाती है

जय जिनेन्द्र साथियो

आज हम ज‍िस बात पर चर्चा करने जा रहे हैं, वह आज के समय में बहुत ही प्रासंगिक है। यही है जो हमें इस कठ‍िन पर‍िस्‍थ‍ित‍ि से बाहर नि‍कलने में मदद करेगी। म‍ित्र हम बात कर रहे हैं सकारात्मक विचार की…!    दरअसल आज पूरी दुन‍िया यह बात जानने लगी है क‍ि हम जैसा सोचते हैं वही बन जाते हैं। अब हम यहां देखते हैं कि जैन धर्म में सकारात्मक विचार के बारे में क्या कहा गया है। आज से 2 हजार वर्ष पहले जब इस भारत भूमि पर महान दिगम्बर जैन आचार्य, जिनके नाम पर श्रमण परंपरा चलती है आचार्य कुंदकुंद देव विचरण करते थे। जिन्होंने 84 पाहुड की रचना की तथा हमें आत्म कल्याण का उपदेश दिया। उन्होंने अपने ग्रंथ समयसार जी में एक गाथा लिखी है वह इस प्रकार है-

सुद्धं तु वियाणंतो सुद्धं चेवप्पयं लहदि जीवो।

जाणंतो दु असुद्धं असुद्धमेवप्पयं लहदि।। 193

जो जानता मैं शुद्ध हूं वह शुद्धता को प्राप्त हो।

जो जानता अविशुद्ध वह अविशुद्धता को प्राप्त हो।।

इसका सामान्य अर्थ यह है कि हम जैसा सोचते हैं हम वैसे ही हो जाते हैं। अगर हम सोचें कि हमें गुणी बनना है, तो हम गुणवान बन जाएंगे और अगर इसके विपरीत सोचा, तो हम वैसे बन जाएंगे। ये सब हमारे विचार और सोच पर आधारित है। इससे हम बड़ी से बड़ी समस्या को भी हल कर सकते हैं।

इसे हम एक उदाहरण से समझते हैं

एक बार की बात है कुछ अमेरिकी वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग करने की सोची क‍ि आखिर हम जो सोचते हैं वह वास्तव में होता है या नहीं? इसके लिए उन्हें एक व्यक्ति की आवश्यकता थी, तो वे न्यायालय गए और न्यायाधीश को अपनी बात बताई। तब वहां पर एक मुज़रिम आया जिसे सजा ए मौत मिलने वाली थी। और वह सज़ा यह थी कि कोबरा के दंश से उसे मृत्यु की सजा सुनाई गई। अब वैज्ञानिकों उस व्यक्ति को प्रयोगशाला में लेकर आए और उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी। अब एक वैज्ञानिक ने उसके हाथ में एक सुई चुभोई, जिससे कुछ समय बाद उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। और जब उसकी रिपोर्ट आई तो सब हैरान थे क्योंकि रिपोर्ट में लिखा था कि कोबरा के ज़हर से व्यक्ति की मृत्यु हुई है।

तब उन वैज्ञानिकों ने बताया कि उस व्यक्ति ने सजा सुनने के बाद वैसी ही धारणा बना ली थी कि अब कोबरा उसे काटने वाला है जिससे सुई चुभाने पर भी उसके शरीर में कोबरा का ज़हर बनना शुरू हुआ और वह व्यक्ति मर गया।

इस घटना से हमें यही शिक्षा मिलती है कि चाहे जितनी भी विकट परिस्थिति हो हम अगर पहले से ही हार मान लें, तो हम जीतकर भी हार जाएंगे, लेकिन अगर हमने धारणा बना ली कि मैं इस परिस्थिति का सामना कर सकता हूं, तो हम आसानी से उसका हल निकाल लेते हैं। तो हम सब इस बात को समझें और अपने विचार में सकारात्मकता लाएं, जिससे हमारा जीवन सुखी हो ऐसी भावना है।

मो‍ह‍ित जैन

शिक्षक, अधीक्षक, स्‍वतंत्र लेखन,

मध्यप्रदेश में न‍िवास.