क‍िसी के चेहरे पर मुस्‍कान लाती हूं तो लगता है ज‍िंदा हूं मैं

आज हम आपको म‍िला रहे हैं राजस्‍थान के उदयपुर में रहने वाली एक ऐसी मह‍िला उषा चौधरी से जो प‍िछले 26 वर्ष से अनवरत समाज को नई द‍िशा देने में जुटी हुईं हैं। 14 वर्ष की अल्पायु में ही राजस्थान की ऊषा चौधरी ने अपने आस-पास की महिलाओं की दयनीय स्थिति को समझ लिया और उन पर हो रहे अत्याचारों का विरोध करने की ठान ली। फिर शुरू हुआ उलाहनों, तानों, मारपीट और तमाम तरह की प्रताडऩाओं का सिलसिला। पर वे डिगी नहीं… और आज तक उन्‍होंने 20 हज़ार से ज्‍यादा बाल विवाह रुकवाए हैं। तीस हजार युवतियों को स्कूल तक ले जाने का काम क‍िया और पांच हज़ार महिलाओं को घरेलू हिंसा से मुक्त करने का काम क‍ि‍या है।

भारत में महिलाओं की स्थिति पर लगातार चर्चा-परिचर्चा होती रहती है। आंकड़े बताते हैं कि हम दिन-ब-दिन बेहतरी की ओर बढ़ रहे हैं (There is a constant discussion and discussion on the status of women in India.)। महिलाएं नौकरियों में आ रही हैं, बिना दहेज़ के विवाह भी बड़े पैमाने पर शुरू हुए हैं, पर यह तसवीर का एक पहलू है, जिसका दूसरा पहलू बताते हुए ऊषा कहती हैं, ‘कहने को तो हम बहुत बेहतर होते जा रहे हैं, पर दुर्भाग्य की बात यह है कि यह बदलाव शहरों में ही हो रहा है, लेकिन आज भी भारत के गांवों में 100 में से 80 महिलाओं को शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है। समाज में इस हिंसा को एक तरह से मान्यता है। वे कहतीं हैं क‍ि शहरों की कामकाजी मह‍िलाओं का जीवन और भी कठ‍िन है। हम 21वीं सदी में हैं, पर आधी आबादी अभी भी हास‍िए पर है। हां यह भी सच है क‍ि स्‍थ‍ित‍ियों में काफी सुधार भी आया है। बहुत-सी मह‍िलाओं का जीवन बेहतर भी है(Many women have a better life)। पर सवा सौ करोड़ की जनसंख्‍या वाले देश में यह कुछ करोड़ मह‍िलाएं ही बेहतर जीवन पा रहीं हैं।

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ऊषा (Usha) की कहानी भी संघर्षों से भरी पड़ी है। पर वे प‍िछले 25 वर्षो से लगातार लड़तीं आ रहीं हैं। पहले अपने ल‍िए लड़ीं अब अपनी बहनों के ल‍िए अनवरत लड़ रहीं हैं। उषा के साथ वर्तमान में 25 लोगों की फुल टाइम टीम है, 17 फैलो और 400 वालेंट‍ियर काम करते हैं। इन सभी साथ‍ियों ने म‍िलकर अब तक राजस्थान के 150 गांवों में सक्रिय ‘विकल्प’ लड़कियों, युवतियों और महिलाओं के जीवन को एक नया मंच द‍िया है। इन्‍होंने अब तक 20 हज़ार बाल विवाह रुकवाए हैं। तीस हजार युवतियों को स्कूल तक ले जाने का काम क‍िया और पांच हज़ार महिलाओं को घरेलू हिंसा से मुक्त करने का काम क‍ि‍या है।

14 वर्ष की अल्पायु में ही उनका विवाह तय कर दिया गया। इससे पहले वे सोचती थीं कि चूंकि मैं चित्‍तौडग़ढ़ शहर में रहती हूं, तो मेरा बाल विवाह नहीं होगा। 14 वर्षीय ऊषा ने इसका ज़ोरदार विरोध किया। उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया — मारपीट, समझाइश और भय दिखाकर आख‍िरकार लोग हार गए… एक छोटी-सी बच्ची का इरादा जीत गया। ऊषा बताती हैं, ‘मैंने बचपन से ही बहुत वॉइलेंस देखा था, मेरे पिता भी मां पर बल प्रयोग करते रहे, मेरे पड़ोस की महिलाएं तो अक्सर पिटती रहतीं। वे दिन भर दूसरों के घरों में काम करके लौटतीं, तो पति उन्हें जमकर पीटता… मैंने उन्हें खून से लथपथ देखा… वे अक्सर रात भर रोती रहतीं और बिना खाए-पिए सुबह काम पर निकल जातीं। उनके घावों पर कोई मरहम रखने वाला नहीं होता और उन्हें पीटने वाला आराम से सोता रहता। सच कहूं तो मेरे बाल मन ने तभी यह तय कर लिया कि मैं पढ़ाई करूंगी और ऐसे लोगों का विरोध भी जो महिलाओं पर अत्याचार करते हैं।

ऊषा अपने जीवन को बेहतर बनाने की राह पर चल पड़ीं (Usha set out on a path to improve her life), सबसे पहले तो उन्होंने अपने घर की छत पर एक छोटा-सा स्कूल शुरू किया, जिसमें आस-पास के गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया, कोरियर कंपनी में काम कर किसी तरह उन्होंने 12वीं पास की। अब उन पर दोबारा विवाह का ज़ोरदार दबाव बनाया जाने लगा। इसी दौरान वे उदयपुर में विधवा महिलाओं के लिए काम करने वाले एक एनजीओ (NGO) से जुड़ गईं। ऊषा बताती हैं कि यह उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट रहा। आगे की पढ़ाई उन्होंने पत्राचार के माध्यम से की। 2003 में अपने कुछ मित्रों के साथ ऊषा ने “विकल्प” की नींव रखी। वे बताती हैं, ‘हम स्कूलों-कॉलेजों में जाकर जागरूकता फैला रहे थे, तभी किसी लड़की ने हमें ‘विकल्प’ नाम सुझाया और इस तरह हमने कार्य को सुचारु रूप से करना शुरू किया। इस दिशा में हमारा सबसे बड़ा काम बच्चियों को शिक्षित करने पर ज़ोर देना है।

हम मई से अगस्त तक एक अभियान चलाते हैं, जिसे हमने ‘आपणी लाड़ली ने स्कूल भेजो’ (अपनी दुलारी को स्कूल भेजो) नाम दिया है। इस कार्यक्रम में हम अभिभावकों को बताते हैं कि बच्चियों की शिक्षा क्यों ज़रूरी है। हमने गांवों में जाकर लोगों को बाल विवाह से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक करना शुरू किया। अक्षय तृतीया के दिन बहुत बाल विवाह होते हैं ऐसे में हम उससे पहले बाल विवाह के कानून की जानकारी देने वाले पोस्टर लगाते हैं और जागरूकता रैली निकालते हैं। बाल विवाह रोकने के लिए भी हम घर-घर में लोगों की काउंसलिंग करते हैं, ज़रूरत पड़ने पर हम पंचायत और पुलिस की मदद भी लेते हैं। राजस्थान के 150 गांवों में सक्रिय ‘विकल्प’ लड़कियों, युवतियों और महिलाओं के जीवन को एक नया मंच देने का काम कर रहा है।


20 हज़ार बाल विवाह रुकवाने, तीस हजार युवतियों को स्कूल तक ले जाने और पांच हज़ार महिलाओं को घरेलू हिंसा से मुक्त करने वाली ऊषा से पूछा गया कि आपने विवाह क्यों नहीं किया, तो वे बहुत सरलता से कहती हैं, ‘मैं विवाह को बुरा नहीं मानती, पर मुझे लगता है कि मैं अपनी बहनों की मदद के लिए बनी हूं। यदि मैं अपने इस जीवन में एक बच्ची को स्कूल भेज पाती हूं, किसी बहन को हिंसा से बचा पाती हूं, बाल विवाह रोक पाती हूं, तो रोमांचित होती हूं — किसी को जीवन से और क्या चाहिए होता है! ऊषा को महिलाओं के लिए सराहनीय काम करने के लिए 2012 में ‘द भास्कर वुमन अवॉर्ड, 2013 में ‘लोरियल पेरिस फेमिना वुमन अवॉर्ड, और 2014 में ‘जीजाबाई अवॉर्ड’ से सम्‍मानित किया गया है।