देखते हैं अब इन ‘चाणक्यों’ को !

प्रभात ओझा
इस सप्ताह का आधा हिस्सा बीतते-बीतते एक खबर ऐसी आयी, जिसकी चर्चा भविष्य में भी बने रहने की उम्मीद है। खबर राजनीतिक गलियारे से है, जिसके मुताबिक दो ‘चाणक्य’ एक साथ मिल-बैठकर अगले चुनावों की रणनीति बनाना शुरू किए हैं।शुरू में ‘चाणक्य’ वाली संज्ञा पर ही बात कर लेते हैं। हाल के दिनों में भाजपा के दो धुरंधर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के लिए यह संज्ञा प्रयोग में आयी। इन दोनों नेताओं ने एक नहीं अनेक चुनावों में इस संज्ञा की सार्थकता को सिद्ध भी किया है।

अब इन नए ‘चाणक्यों’ पर सीधे आते हैं। ये हैं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नेता शरद पवार और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर। जहां तक इनकी सफलता की बात है, एक तिहाई ही सही, महाराष्ट्र की सरकार में शरद पवार की पार्टी हिस्सेदार है। प्रशांत किशोर ने जिनके लिए काम किया, बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल सत्ता में तो आ गयी है, पर खुद दीदी हार गईं। फिर भी विश्लेषण मोदी-शाह जोड़ी की होती है, तो पवार-प्रशांत की क्यों न हो? आखिर लोकतंत्र है और लोकतंत्र में हर किसी की संभावना बनी रहती है। फिर भी अनुभव और इतिहास ही विश्लेषण के आधार हुआ करते हैं।

कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद ममता बनर्जी को गैर भाजपा अथवा भाजपा विरोधी मोर्चे के नेता के रूप में देखा जा रहा है। सवाल है कि गैर भाजपा मोर्चा में कांग्रेस की स्थिति क्या होगी? फिर इसका नेता कौन होगा? फिलहाल प्रशांत किशोर ने शुरुआत शरद पवार से की है। उस शरद पवार से जो कांग्रेस में रहते हुए भी उसके नेता के विरोधी बने रहे। क्या पवार उस सोनिया गांधी को नेता मानेंगे, जिनके विदेशी मूल के होने के तर्क पर नेतृत्व नहीं मानकर पवार कांग्रेस से बाहर आ गए थे। जहां तक राहुल गांधी की बात है, नहीं लगता कि सीनियर सोनिया को नहीं मानने वाले पवार जूनियर राहुल पर सहमत हो सकेंगे। फिर जिन ममता बनर्जी के प्रतिनिधि होकर प्रशांत मुंबई के सेवन ओक में पहुंचे थे, वह दीदी ही क्या मां-बेटे को नेता स्वीकार कर लेंगी?  

बहरहाल मान लेते हैं कि शरद पवार ने शिवसेना और कांग्रेस जैसे दो विपरीत विचारधारा वालों को एक कर लिया है, तो भविष्य में भी ऐसा ही कुछ बड़ा भी कर लेंगे। फिर भी सवाल तो बना ही रहेगा कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य का क्या होगा, जहां हर पल तेवर कड़े किए बहनजी, यानी मायावती भी मौजूद हैं। अब बड़ा प्रश्न कि ऐसे में महाराष्ट्र और बंगाल की तरह के ही हथियार लोकसभा चुनावों में कारगर हो पाएंगे? फिर चुनाव प्रचार की नई तकनीक, बीजेपी का विशिष्ट प्रचार तंत्र और पेशेवर चुनाव प्रबंधन भी इस संभावित गठबंधन के सामने चुनौती की तरह होंगे। वैसे 2024 के लोकसभा चुनाव अभी बहुत दूर हैं। उसके पहले उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में विधानसभा का समर होगा। साथ में पंजाब भी है, जहां साप्ताहांत में शिरोमणि अकाली दल का बहुजन समाज पार्टी से समझौता हो चुका है। क्या एक राज्य में कांग्रेस के विरोध में खड़ी मायावती अपने गृह प्रदेश में कांग्रेस से एका कर पाएंगी, इस पर संदेह है। ऐसे में जो साथ आएं, उन्हो को लेकर आगे बढ़ने की रणनीति बन सकती है।

ऐसे में एक तीसरे मोर्चे की संभावना बन सकती है। फिर भी अभी बहुत सारे अन्य बिंदु भी हैं, जिन पर चर्चा होगी। अभी समय भी है, फिर चाणक्यों की यह नयी जोड़ी ही अंतिम होगी, इसकी कौन गारंटी ले सकता है।