क्या महामारी से जूझता रहेगा भविष्य का भारत?

बड़ा सवाल : आजादी के 74 साल बाद भी हमारा स्वास्थ्य तंत्र लचर-लाचार

बीते डेढ़ वर्ष में भारत ने जो कुछ देखा-सहा-भोगा, उसने देश के हर नागरिक के मन में भारी उथल-पुथल मचा दी। कोरोना की दूसरी लहर ने जिस तरह से देश में कहर बरपाया, उसने सिर्फ अर्थव्यवस्था को कमजोर ही नहीं किया, बल्कि लोगों के मनोबल को भी तोड़ कर रख दिया। खासकर इस साल अप्रेल और मई की शुरुआत में देश का जो माहौल भयावह स्थिति में दिखा, उसे कोई भूल नहीं सकता। जिस पर बीती और जिसने इसकी पीड़ा को सहा, उन्होंने जीते-जी नर्क को भोगा।

21वीं शताब्दी के भारत में अस्पतालों में ऑक्सीजन और बेड की कमी से लोगों ने दम तोड़ दिया। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मानवता को तिल-तिल कर मरते देखा। इन हालात ने उजागर कर दिया कि आजादी के बाद बीते साढ़े सात दशक में नीति-निर्माताओं और भाग्यविधाताओं ने स्वास्थ्य क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने की दिशा में कोई ठोस काम नहीं किया। कोरोना से कोई देश ठीक से निपट नहीं पाया। गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या अगली महामारी के लिए देश तैयार है? कोरोना महामारी पूरी दुनिया के लिए वेकअप कॉल की तरह है। विशेषकर भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश को इसे राष्ट्रीय ख़तरे की तरह से लेना होगा। स्वास्थ्य प्रणाली को प्राथमिकता पर रखकर भविष्य की कार्य योजना बनानी होगी।

एक और सवाल उठता है कि कोरोना की पहली लहर को चुनौती मानकर थोड़े-बहुत एक्शन लिए, लेकिन दूसरी लहर में सब ढीले क्यों पड़ गए? सरकारों के सुस्त रवैये नतीजा लाखों लोगों ने भोगा। अब तीसरी लहर इसी तरह से घातक नहीं हो, उसकी कितनी तैयारी की गई है? बेड, मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर, अस्पताल, दवाई, ऑक्सीजन, जागरूकता और इन सबको रोकने या कम करने के लिए रामबाण इलाज वैक्सीनेशन के लिए क्या ठोस नीति बनाई गई? क्या इस साल देश में वैक्सीनेशन का लक्ष्य पूरा होगा? कोरोना महामारी, वैश्विक महामारी है और 1918 की महामारी के बाद सबसे बड़ी और जानलेवा महामारी है। इससे हुई जान और माल की तबाही ने दुनिया भर को हिला कर रख दिया। भारत में पिछले 14 महीनों में इस अदृश्य दुश्मन ने दो लाख से अधिक लोगों को मार डाला है और दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को बेबस कर दिया। महामारी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को बेदम कर दिया। लोग भयभीत और असुरक्षित हैं। ये राष्ट्र की सुरक्षा का महत्वपूर्ण और गंभीर मामला है।

कोरोना की पहली लहर को सकुुुुशल पार करने वाले भारत को टीकाकरण से राहत की उम्मीद थी। लेकिन जब तक वैक्सीनेशन होता, तब तक दूसरी लहर ने देश को झकझोर कर रख दिया। चुनाव में व्यस्त सरकार के लिए इस बात का अंदाजा लगाना तक मुश्किल था कि दूसरी लहर ऐसी तबाही मचाएगी। जबकि सरकार ने इससे बचाव के इंतजाम ही नहीं किए। कुप्रबंधन, विफल प्रशासन, नौकरशाही का हावी होना, अस्पतालों और चिकित्सा व्यवस्था का लड़खड़ाता ढांचा, गांवों में बदइंतजामी ने सरकार की पोल खोल कर रख दी। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत तीसरी लहर के लिए कितना तैयार है? कनाडा और यूरोपीय देशों में कोरोना की तीसरी लहर के प्रभाव को देखते हुए विशेषज्ञों ने अनुमान जताया है कि भारत में इसका प्रभाव सितंबर माह तक देखने को मिल सकता है। डबल म्यूटेंट वाले कोरोना वायरस के दूसरी लहर ने न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में खासी तबाही मचाई है। ऐसे में तीसरी लहर की आहट ने समूचे विश्व के शीर्ष स्वास्थ्य संगठनों, सरकारों, प्रशासनिक अमले के साथ जनमानस को गंभीर चिंता में डाल दिया है। 

स्वास्थ्य सेवाओं को रखना होगा प्राथमिकता में

हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर कितनी प्राथमिकता, मजबूती और जिम्मेदारी से काम किया गया है, किसी से नहीं छिपा है। स्थितियां इतनी संगीन हैं कि आंकड़ों को टटोले तो भयानक तस्वीर सामने दिखती है। हर एक अस्पताल के बेड पर 1700 मरीज़ हैं। राज्यों की बात करें तो बिहार के हालात सबसे ख़राब है। सार्वजनिक अस्पतालों के अलावा सरकार के पास सेना के लिए बने अस्पताल हैं। रेलवे अस्पताल भी हैं। लेकिन कोविड जैसी बड़ी आपदा व महामारी से लड़ने के लिए ये कितने तैयार हैं, इसका सच दूसरी लहर में सामने आ गया। कोविड-19 से निपटने के लिए केंद्र और राज्यों की सरकारों को योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के आंकड़ों के मुताबिक़ देश भर में 2018 तक साढ़े 11 लाख एलोपैथिक डॉक्टर उपलब्ध हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ डॉक्टर और मरीज़ों का अनुपात हर 1,000 मरीज़ पर 1 डॉक्टर का होना चाहिए। 135 करोड़ की भारत की जनसंख्या में डॉक्टरों की संख्या बेहद कम है और डब्ल्यूएचओ के नियम के मुताबिक़ तो बिलकुल भी नहीं है। नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल 2019 के आंकड़ों की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में लगभग 26 हजार सरकारी अस्पताल हैं, जिनमें से 21 हजार ग्रामीण इलाक़ों में हैं और 5 हजार अस्पताल शहरी इलाक़ों में हैं। संख्यात्मक रूप ये आंकड़े थोड़ी राहत ज़रूर देते नज़र आते हैं, लेकिन बात हर मरीज़ और उपलब्ध बिस्तरों की संख्या के अनुपात में होगी तो ये आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। इंडियन सोसाइटी ऑफ़ क्रिटिकल केयर की मानें तो देश भर में करीब 70 हज़ार आईसीयू बेड हैं। तकरीबन 40 हज़ार वेंटिलेटर हैं, जिनमें अधिकतर मेट्रो शहरों, मेडिकल कॉलेजों और प्राइवेट अस्पतालों में उपलब्ध हैं।

देश की रक्षा आवश्यक, पर स्वास्थ्य उससे भी जरूरी

साल 2020-21 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का बजट करीब 65 हज़ार करोड़ रुपए था, जबकि रक्षा का बजट चार लाख 71 हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा। रक्षा मंत्रालय का आवंटन केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों में सबसे अधिक है। रक्षा पर ख़र्च केंद्र सरकार के बजट का 15.5 प्रतिशत है, जो स्वास्थ्य में 2 प्रतिशत से तकरीबन साढ़े सात गुना ज़्यादा है। भारत के पाकिस्तान के साथ तीन बड़े युद्ध हुए और चीन के साथ एक। पिछले दो दशकों में भारत पर कई घातक चरमपंथी हमले हुए, जिनमें सैकड़ों देशवासियों की जानें गईं। अब तक हुए छोटे-बड़े सभी युद्धों और चरमपंथी हमलों को मिलाकर भी इतने लोग नहीं मरे या अर्थव्यवस्था को इतनी क्षति नहीं पहुंची, जितनी इस अदृश्य दुश्मन कोरोना से पहुंची है। गंभीर बात तो ये भी है कि यह सब कुछ अभी थमा नहीं है। विश्व के परिप्रेक्ष्य में हमारे देश को को देखें तो भारत 135 करोड़ की आबादी के साथ दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या, सातवां सबसे बड़ा क्षेत्रफल और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला विकासशील देश है। आबादी के लिहाज से हेल्थकेयर सेक्टर में डिफेंस सेक्टर के बजाय तुलनात्मक रूप से समग्र बजट का कम हिस्सा ही खर्च किए जाने की परंपरा रही है। लेकिन कोरोना वायरस रूपी इस अदृश्य शत्रु ने मौजूदा सरकार को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने को विवश कर दिया है। वह इसलिए भी की जब अमरीका, जापान, इटली, जर्मनी समेत अन्य विकसित यूरोपीय देशों की स्वास्थ्य सेवाएं ध्वस्त हो गईं तो भारत की दशा चिंताजनक होनी ही थी।

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राजेश कसेरा
वरि‍ष्‍ठ पत्रकार हैं
वि‍गत 17 वर्षों से पत्रकारि‍ता में सक्रि‍य
वि‍विध वि‍षयों पर लेखन  
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