Applied Spirituality for Pentium generation : प्रार्थना : ईश्वर को एक ‘मिस्ड कॉल ! भाग -33

धर्म क्या है और सभी धर्मों का मूूल और उसमें क्या क्या विभिन्नता और समानता है। इसके अलावा विश्व में विभिन्न धर्मों को लेकर लोगों की क्या समझ और मान्यता है,और धर्म की वर्तमान स्थिति से हमें अवतत करा रहें हैं शरणागत अजीत

प्रश्न: अध्यात्म पर से मन डिगने लगता है, जब अलग अलग धर्मों के द्वारा फैलाई जा रही नफरत ,धर्मांध मूर्खता, सुनकर ऐसा लगता है की कोई धर्म ऐसा कैसे हो सकता है? और फिर ऐसे माहौल में किस बात पर विश्वास करें? कुछ धर्म कहते हैं कि न सिर्फ वही अकेले सही हैं, बाकि सब गलत, और कुछ तो यह मानते हैं की उनके अनुयायियों के अलावा किसी और को जीने का हक़ ही नहीं है, इस पर थोड़ा प्रकाश डालें ।

शरणागत अजीत:
आपकी मनो: स्थिति समझ सकते हैं लेकिन मन छोटा या खराब न करें । हमने शुरू में ही बताया था कि अध्यात्म अगर दवा का कंपाउंड ( Chemical Compound/ Ingredient ) है, तो धर्म ( Religion) या यूँ कहें कि पंथ, दवाईयों के ब्रांड का नाम ( Brand Name) हैं । जैसे सर दर्द की दवा एस्पिरिन ( Aspirin ) अलग अलग कंपनियां अलग अलग नाम – जैसे एस्प्रो , डिस्पिरिन , सेरिडॉन या अनासिन के नाम से बाजार में निकालती हैं ,और बेचती हैं । और हर कंपनी अपनी दवा को प्रमोट करने के चक्कर में रहती है ।लेकिन इन सभी टेबलेट्स में मूल यौगिक अवयव ( Chemical Compound) एस्पिरिन नाम का रसायन है। समझदार आदमी को दवा से मतलब होता है, उसे ब्रांड नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता है, न ही उसके अहंकार को कोई चोट पहुँचती है, उसकी Ego, hurt होती है । ठीक उसी तरह सेल फोन टेक्नोलॉजी ( Mobile Phone Technology) एक ही है, लेकिन अलग अलग सर्विस प्रोवाइडर्स ( service Providers) उसे अपने अपने ब्रांड के नाम पर सिम देकर अपने उपभोक्ताओं ( Subscribers) को बेचते हैं और उन्हें Connectivity प्रदान करते हैं ।

तो अध्यात्म ( Spirituality) ज्ञान व मूल तकनीक है, सृष्टा और सृष्टि के बारे में, और मानव शरीर में जीवन जीने की , और अलग अलग धर्म ( Religions) सिर्फ सर्विस प्रोवाइडर्स हैं, उस तकनीक को अपने अपने तरीके से उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराने के लिए । अब स्वयं सोचें की क्या कोई सर्विस प्रोवाइडर इस हद्द तक गलत हो सकता है कि खुद को सेल फ़ोन टेक्नोलॉजी का सर्विस प्रोवाइडर होने का दावा करे और लेकिन वास्तव में उसके पास तकनीक या उसकी Expertise कृषि के क्षेत्र में हो । अगर वह स्वयं को सेल फ़ोन का सर्विस प्रोवाइडर कह रहा है, तो कहीं न कहीं वह इस उद्देश्य को पूर्ण करने में सक्षम होगा या किसी एक समय पे रहा होगा ।हाँ यह हो सकता है कि वह लालच या अज्ञानता वश यह दावा करने लगे या वास्तव में इस मुगालते में आ जाये, की उसके ब्रांड के अलावा बाकि सब सर्विस प्रोवाइडर्स गलत हैं, या फिर वह अधर्म और बेईमानी का रास्ता इख्तियार करके दूसरे सर्विस प्रोवाइडर्स के उपभोक्ताओं को लालच या भय दिखाकर, ज़बरदस्ती अपने ब्रांड में परिवर्तित ( Port ) करने का प्रयास करे । अब अगर ऐसा करना सभ्य समाज व लोगों द्वारा स्वीकृत कर लिया गया, तो कोई भी अन्य सर्विस प्रोवाइडर सुख चैन से नहीं रह सकेगा ।

इससे ऐसे अज्ञानी व अधर्मी सर्विस प्रोवाइडर का दुस्साहस और भी ज़्यादा बढ़ेगा और वह किसी दूसरे Service Provider के उपभोक्ता को चैन से नहीं रहने देगा । हो सकता है कि उसका दुस्साहस इतना बड़ जाये कि वह अपनी ब्रांड का मिशन स्टेटमेंट ही यह घोषित कर दे, कि बाकि और सभी ब्रांड के उपभोक्ता काफिर हैं और उनका सर्वनाश करने से उसके मार्केटिंग मैनेजर्स को आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन दिया जायेगा ।सोचिये कितनी भयावह स्थिति होगी और फिर बाकि सभी सर्विस प्रोवाइडर्स को भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए उसी पाशविक स्तर पर उतरना पड़ेगा । सब सर्विस प्रोवाइडर्स पशुओं के स्तर पर उतरने को बाध्य हो जायेंगे ? और यह मार्किट शेयर बढ़ाने की पागलपन की दौड़ इस सेल फ़ोन टेक्नोलॉजी के अविष्कार को मानवता के लिए एक अभिशाप बना कर ही छोड़ेगी। कभी सुना है कि एयरटेल और बीएसएनएल के उपभोक्ताओं के बीच दंगा हो गया और मार काट मची है?

इससे निम्न चीज़ें साफ़ होती हैं:
१. की कोई भी धर्म ( Religion) मूलतः गलत नहीं हो सकता है, यदि वह वास्तव में धर्म ही है, पाशविक मानसिकता की ताकत के बल पर पर आधिपत्य ज़माने की कोई शैतानी, जंगली रणनीति नहीं ।
२. हाँ उस धर्म को मानने वाले गुमराह हो सकते हैं, या उन्हें गुमराह किया जा सकता है । शायद इसलिए , क्योंकि वहां बुद्धिमान और साहसी लोगों का अभाव हो, जो डर के मारे चुप रहने पर मजबूर हैं, क्योंकि वहां जंगलियों की बहुतायत हो ।
३. यह मानना मूढ़ता का जीता जागता प्रमाण है कि सिर्फ किसी एक का धर्म ही सही है और बाकि सभी गलत, या बाकि को अपने धर्म में लाकर उनका उद्धार करना उनके ही धर्म की ज़िम्मेदारी है । क्योंकि मानव योनि न जाने कब से चली आ रही है और ऐसा बिलकुल नहीं है की एक ख़ास धर्म के उदय से पहले परमात्मा का कारोबार बंद था और उस धर्म के संस्थापक के अवतरण के बाद ही सृष्टि का संचालन शुरू हो सका है और सारी कायनात का बोझ उस ख़ास धर्म के अज्ञानी और मूर्ख सब्सक्राइबर्स के कन्धों पर ही आ पड़ा है ।
४. किसी दूसरे धर्म के लोगों को भय या लालच दिखा कर अपने धर्म में धर्मांतरित करने से बड़ा मूर्खता पूर्ण कार्य और उनके अपने अवतार पुरुष का इससे ज़्यादा अपमान किसी दूसरे तरीके से नहीं किया जा सकता है । शायद और किसी कोई दूसरे धर्म के अनुयायी भी नहीं कर सकते जितना इस मूर्खतापूर्ण कार्य को करके उस धर्म के अनुयायी स्वयं करते हैं । एक जीवन काल इतना छोटा समय होता है की यदि इंसान स्वयं अपने आप को ही सही मायनो में कन्वर्ट कर ले वही सबसे बड़ी उपलब्धि होगी, दूसरों को कन्वर्ट करने का समय ही कहाँ है, किसके पास है ?
५. धर्म कोई राजनैतिक पार्टी या मार्किट में उपलब्ध प्रोडक्ट नहीं है, कि जिसकी मेम्बरशिप ड्राइव चलाकर या मार्केट शेयर बढ़ाने से सेल्स डिपार्टमेंट को जन्नत रुपी प्रमोशन मिलेगा। ऐसा मानने और करने वाले धर्मांध लोगों को इस बात का अहसास करवाना होगा कि धर्म परिवर्तन करवाने वालों के अवतार पुरुष, अगर आज नीचे उतर आएं तो उनकी अपने धर्म की हालत और मानसिकता देखकर वही हालत होगी, जो गाँधी जी की होगी, यदि गाँधी जी आज अचानक इंडिया आ जाएं और अपनी प्रिय राजनैतिक पार्टी की दुर्दशा को अपनी आँखों से देखें ।
हमारा वैदिक ज्ञान वह ज्ञान है जो उस समय दिया गया था जब सृष्टि की रचना हुयी थी I यानि कि वह मूल ज्ञान है, जो सृष्टि के आरम्भ में दिया गया था ।

जिसमे सृष्टि के नियमों और मूल सिद्धांतों को बारीकी से, और अत्यंत विस्तार में परिभाषित किया गया था ।
इस शाश्वत ज्ञान में सृष्टि की रचना के समय न सिर्फ मूल सिद्धांतों का वृस्तृत वर्णन किया गया था बल्कि मानव योनि रुपी, इस मशीन का पूरा सर्किट डायग्राम और ऑपरेटिंग इंस्ट्रक्शंस – सोर्स कोड ( Circuit diagram and Operating Instructions – User Manual , alongwith the Source Code) के साथ बताई गयीं हैं। बिना किसी राग द्वेष के। यहाँ तक की किसी वेद आदि के रचियता ने न ही कहीं अपने नाम का टाइम कैप्सूल ( Time Capsule) डालने का प्रयास किया है, नहीं किसी अवार्ड की आकांशा से अपना नाम ही बताया है, पेटेंट वगैरह हासिल करने की कोशिश जैसी घटिया हरकतें करना तो बहुत दूर की बात है ।

यही सनातन धर्म का मूल एवं आधार है । अब क्योंकि सनातन धर्म में सृष्टा, सृष्टि और इससे सम्बंधित हर संभव प्रश्न के बारे में विस्तार से सारी जानकारी दी गयी है इसलिए सनातनी हिन्दू किसी भी धर्म को समझने में अपने आप को असमर्थ नहीं पाते हैं और समझ जाते है कि कोई भी अन्य धर्म किस बात की, और कहाँ किस डायमेंशन की, बात कर रहा है या किस विषय वस्तु पर केंद्रित है। और इसीलिए उन्हें सबसे ज़्यादा सहिष्णु होने में कोई दिक्कत नहीं आती है । परेशानी बाकि उन धर्मों में आती है जहाँ ज्ञान या तो पूरी तरह से आम आदमी को उपलब्ध नहीं है, या उसे समझाने वाले नहीं हैं या जहाँ जानबूझ कर अपने अनुयायियों को स्वार्थवश अँधेरे में रख कर उनका गलत इस्तेमाल किया जाता है ।

सनातन धर्म से निकलने वाले जितने भी धर्म हैं वह कहीं कहीं तो सनातन धर्म की सिर्फ कुछ डाइमेंशन्स को पकड़ कर ही अपने आप में एक नए धर्म का दर्ज़ा प्राप्त कर गए । ज़्यादातर धर्म चाहे वह बुद्धिज़्म हो या जैन धर्म हो यह दोनों सिर्फ अष्टांग योग के यम-नियम के इर्द गिर्द ही विकसित हो गए, इतना वृस्तृत है सनातन का ज्ञान, और उसकी उपलब्ध टेक्नोलॉजी । हमारा सिख धर्म भक्ति योग का जीता जागता उदाहरण है । इसी तरह न जाने कितने सम्प्रदाय सनातन में समाहित हैं और इसीलिए हिन्दू धर्म के अनुयायी कभी भी बाकि धर्मों को समझने में अपने को असमर्थ नहीं पाते हैं । परेशानी उन धर्मों के साथ आती है जहाँ सारा ज्ञान एक ही पुस्तक में समाहित है और जहां यह भी नहीं पता है की कितना सही बताया जा रहा है या कितना जान बूझकर छिपाया या डिसटॉर्ट( Distort) किया जा रहा है ।

चिंता का विषय सिर्फ यह है की एक तरफ से होने वाली पाशविक हरकतें दूसरे तरफ के लोगों को भी उत्तेजित करती हैं और किसी भी एक धर्म की तरफ से होने वाला पाशविक व्यवहार दूसरे – वह चाहे कितने भी सहिष्णु क्यों न हों, उनको भी उनके जैसे ही पाशविक स्तर पर उतरने को मजबूर करता है । और किसी को यह गलत फहमी नहीं होनी चाहिए की सिर्फ उनकी ही जंगली मानसिकता और पाशविक लोगों पर मोनोपोली है । पाशविक प्रवृत्त्ति का जवाब पाशविक स्तर पर दूसरी और से भी उतनी ही प्रचंडता से आता है, इसी बात का देश और समाज को खतरा है । ज़रुरत है की हर धर्म को, उसके सार को समझने वाले, उसके प्रबुद्ध अनुयायियों को, अपने धर्म का नेतृत्व करना चाहिए ताकि उनके अज्ञानी लोगों की भीड़, धर्म के नाम पर उनके धर्म का गलत इस्तेमाल न कर सकें और नफरत न फैला सकें । अगले सप्ताह इस पर और बात करेंगे और आपके मूर्ती पूजा के Relevance and Logic के सवाल पर चर्चा करेंगे।
प्रश्न: आज का सूत्र क्या होगा?
शरणागत अजीत: जहाँ तक हो सके, हर दो तीन महीने में एक अंत्येष्टि में ज़रूर शामिल हों ।
Try and attend a funeral every two three months, as it helps keep us grounded to reality
Practice death every day for ten minutes. As this is the compulsory question, that all of us have to answer in our final examination.
आज का सूत्र है:
हर रोज़ दस मिनट मृत्यु का अभ्यास करें, क्योंकि यही वह अनिवार्य प्रश्न है, जो हम सबको अपनी फाइनल परीक्षा में फेस करना है’ ।
आज बस इतना ही
At HIS feet,
🙏🙏🙏

नोट – पाठक अपनी क‍िसी भी तरह की ज‍िज्ञासा प्रश्‍न के माध्‍यम से शरणागत के सामने रख सकते हैं, ज‍िसका उत्‍तर वे हर अंक में देगें। आज से हर गुरूवार को हिंदी और रव‍िवार को अंग्रेजी में यह आलेख शृंखला चलेगी। इस पते पर सवाल भेजें :

शरणागत अजीत लेखक IIT से शिक्षा के बाद सिविल सेवा में रहते हुये..उच्च प्रशासनिक पदों पर काम करते हुए अध्यात्म का संधान करते रहे। ‘एप्लाइड स्प्रिचुअलिटी’ (Applied Spirituality) और ‘टेक्नोलोजों ऑफ स्प्रिचुअलिटी’ ( Technology of Spirituality) पर देश और दुनिया भर में वार्ताएं कीं। ‘अहम ब्रह्मास्मि- व्हेन नोड बिकम्स द सर्वर’ ( ‘अहम ब्रह्मास्मि- When Node becomes the Server) नामक पुस्तक की रचना की। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या से व्यथित होकर व्यक्तिगत क़दम उठाया और किसानों के बच्चों की देख-रेख का ज़िम्मा लिया।टाइम्स आफ इंडिया के ‘स्पीकिंग ट्री. इन’ पर अध्यात्म के विषयों पर ब्लाग भी लिखे हैं । आपके द्वारा दिया गया मैनेजमेंट शिक्षा एवं प्रैक्टिस पर नया concept: “Corporate Spiritual Responsibility “ Management Education के क्षेत्र में बहुत चर्चा एवं उत्सुकता का विषय बना हुआ है। बैंगलोर के दो Management Education Institutes ने अपने यहॉं ‘सेंटर फ़ार कारपोरेट स्परीचुअल रेस्पौन्सबिलिटी’ की स्थापना भी की है और इस विषय पर काम जारी है।’CSpR’ में आपकी परिकल्पना निम्न प्रकार है: 1. ‘व्यवस्था’ of any organisation depends on the ‘अवस्था’ of its Managers. 2. Quality of your ‘Being’ will decide the quality of your ‘Doing’. Hence, of your ’Living’. इस विषय पर हम आगे के अंकों में विस्तार से चर्चा करेंगे। वर्तमान में युवा और बच्चों में अध्यात्म के बीज डालने के लिए तकनीकी का बख़ूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके लिए इंटरनेट इस सदी की सबसे बड़ी आध्यात्मिक खोज है।