Applied Spirituality for Pentium generation : प्रार्थना : ईश्वर को एक ‘मिस्ड कॉल’! भाग – 37

कहते हैं कि श‍िक्षा हमें अंधव‍िश्‍वास से दूर करती है, लेक‍िन इस वाक्‍य की आड़ में बड़े पैमाने पर लोग आस्‍था और अंधव‍िश्‍वास के बीच के अंतर को समझ नहीं पाते। और कुछ कथ‍ित समझदार लोग अक्‍सर आस्था को अंधव‍िश्‍वास की तरह देखते हैं। ऐसे में शरणागत अजीत आज हमें व‍िस्‍तार से बता रहे हैं क‍ि आस्‍था क‍िसी भी रूप में जीवन को बेहतरी की द‍िशा में ही ले जाती है। ये अस्‍था है जो जीवन को सुंदर से सुंदरतम बनाती है…

प्रश्न: पिछले कई दिन से आप काशी प्रवास पर थे। इन स्थानों का, और वहां जाने का क्या वास्तव में कोई महत्त्व होता है?

शरणागत अजीत : हां, इसीलिए पिछले दो गुरूवार का अंक भी नहीं हो पाया। काशी, मैं अपनी माता जी, जिन्होंने पिछले वर्ष 17 जुलाई को शरीर छोड़ा था, उनके वार्षिक श्राद्ध, जिसे उत्तर भारत में हम बरसी कहते हैं, उसकी पूजा इत्यादि के लिए गया था। अब क्योंकि काशी में यह श्राद्ध करने का अवसर मुझे मिला था, इसलिए मैं अपने सभी पूर्वजों के साथ साथ अपने सभी टीचर्स और ख़ास कर मुझे आईएएस परीक्षा में बैठने के लिए प्रोत्साहित करने वाले मेरे रूड़की के गुरु सर चांद मल (Sir Chand Mal, ICS) जिन्होंने 1930s में ICS परीक्षा में टॉप किया था, उनका भी श्राद्ध कर सका। साथ ही साथ मैं अपने सभी मित्रों, नौकर चाकर एवं उन सबका, जिन्होंने ज़िन्दगी में मेरी मदद या सेवा की हैं, और इस तरह जिनका मेरे ऊपर ऋण है, और जो अब दुनिया में नहीं हैं।

मैं हर वर्ष पितृपक्ष में उनका श्राद्ध करता हूं। उन सबका भी तीर्थ का श्राद्ध कर सका। यह सब बताना इसलिए प्रासंगिक एवं ज़रूरी हैं, क्योंकि ऐसी बातें करना, हमारे देश के नकली अंग्रेज़ों – जिन्हे प्यार से लोग काले अंग्रेज भी कहते हैं, उनकी सोसाइटी में, देहातीपन समझा जाता हैं और लोग यह बातें करने से मुहं छुपाते हैं। शायद अंग्रेज़ियत के शिकार और आधुनिक कहलाने की पागल दौड़ में शामिल, अपने तथाकथित पढ़े लिखे लोगों को यह बात अंधविश्वास मालूम हो, लेकिन मैं उन सभी संस्कारी युवाओं को अपना अनुभव साझा करते हुए यह बताना चाहूंगा क‍ि काशी या गया में अपने माता पिता और अन्य पूर्वजों का श्राद्ध करना हर संतान का आध्यात्मिक दायित्व होता है और जो अपने मां बाप के लिए इतना भी नहीं कर सकता, उससे ज़्यादा श्रापित एवं अभागा कोई नहीं हो सकता। मातृ एवं पितृ ऋण से आप मुक्त, तो कभी भी नहीं हो सकते, लेकिन अपनी सामर्थ्य भर उस दिशा में प्रयास करके अपनी कृतज्ञता तो अर्पण कर ही सकते हैं। इस विषय पर व्यापक चर्चा कभी और करेंगे।

अब जहां तक सवाल हैं की क्या इन स्थानों पर जाने से कुछ लाभ होता हैं, तो उसे यूं समझें की यह सभी तीर्थ हॉटस्पॉट्स (Hot Spots) की तरह होते हैं, जहां कनेक्टिविटी (Connectivity) बड़ी ही Naturally, स्वाभाविक रूप से फ्लो होती हैं (Flows Naturally)। तीर्थों में आध्यात्मिक नेटवर्क बहुत ही शक्तिशाली होता है और जैसे आप के सेल फ़ोन में घर के कई कोनों में चारों टावर, यानि फुल सिग्नल दिखाई देता है, उसी प्रकार तीर्थ स्थानों में सिग्नल बहुत स्ट्रांग होता है। और यदि आपका आध्यात्मिक सिम कार्ड एक्टिवेटिड हैं, तो आपको बहुत अच्छी कनेक्टिविटी मिलती है। अब यदि कोई यह कहता है क‍ि स्थानों से कोई फर्क नहीं पड़ता है, तो या तो वह एकदम परमहंस की अवस्था में है, या फिर पूरा मूर्ख है। सिर्फ दो ही स्तर के लोग इस तरह की बात कर सकते हैं। मूर्ख इसलिए ऐसा कहेगा, क्योंकि वह मानव शरीर में स्थित ज़रूर हैं, लेकिन उसका ऑपरेटिंग सिस्टम अभी भी पशुओं से भी नीचे है। कम से कम पशु, इंस्टिंक्ट द्वारा (By Instict) सिग्नल्स कैच करते हैं, लेकिन जब पशुओं के ऑपरेटिंग सिस्टम पर ऑपरेट करने वाला मानव शरीरधारी अगर बिना एक्टिवेटिड सिम कार्ड के घूम रहा है, तो उसे सिग्नल या नेटवर्क का कोई ज्ञान या आभास नहीं होगा और वह अपनी मूर्खता को ही ब्रह्म वाक्य मानता रहेगा और दूसरों को मनवाने पर भी ज़ोर देगा। ऐसे लोगों से इस बारे में चर्चा करके समय नहीं गंवाना चाहिए, लेकिन जिसका सिम कार्ड एक्टिवेटिड है, वह तुरंत यह महसूस करेगा और जान जाएगा क‍ि तीर्थ या ऐसे ही अन्य पावरफुल एनर्जी केंद्रों पर कैसे उसके चारों टावर यानि फुल नेटवर्क मिलता है।

परमहंस इसलिए ऐसा कहने का हक़दार है, क्योंकि वह उस आईटी प्रोफेशनल की तरह है, जो अपना बिल्ट इन डोंगल (Built in Dongle) साथ लिए फिरता है, तो उसे सब जगह एक सा ही सिग्नल मिलता है। लेकिन आम आदमी के उद्देश्य के लिए तीर्थ स्थानों व मंदिर आदि जाने का बहुत सार्थक प्रभाव और परिणाम मिलता है। आध्यात्मिक ट्रिगर के एक्टिवेशन में सबसे स्थूल स्तर पर फायदा ऐसे होता है क‍ि इन तीर्थ या अन्य स्ट्रांग एनर्जी सेंटर्स पर जाने की सोचने वाले और वहां तक पहुंचने वाले ज़्यादातर लोग सतोगुण प्रधान होते हैं। सतोगुण आध्यात्मिक धारा के प्रवाह के लिए बहुत ही सुपर कंडक्टर माध्यम होता है। अतः उस वातावरण में जाकर आप की दशा एवं दिशा उर्ध्वगामी होती है, जैसे की सत्संग में होता है। ज़ाहिर है कि गोवा के बीच पे हाथ में बियर की बोतल लिए और बिकिनी में घूमते हुए टूरिस्ट और एक तीर्थ स्थान पर मिलने वाले लोगों की चेतना और उससे निकलने वाली ऊर्जा की किरणों में ज़मीन आसमान का अंतर होता है, जो आपके अंतःकरण को अपनी अपनी दिशा में चुम्बकीय प्रभाव कि तरह खींचता है।

एक आम आदमी के लिए इतना जान व समझ लेना काफी है क‍ि‍ हर व्यक्ति, हर स्थान एवं हर समूह अपने आप में एक ऊर्जा का स्त्रोत है, और उन सबसे लगातार ऊर्जा की तरंगें, जो की इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों से भी कुछ ज़्यादा ही गुण, तासीर (Attributes) एवं महत्त्व रखती हैं, प्रसारित होती रहती हैं और अपने आस-पास के वातावरण एवं हर जीवंत एवं निर्जीव चीज़ को प्रभावित करती है। ठीक उसी तरह, जैसे की रात में यदि आप अपना मोबाइल अपने तकिए के पास रख कर सोते हैं, तो उससे निकलने वाली तरंगे आपके मस्तिष्क और आपकी कोशिकाओं को प्रभावित करती हैं। जैसे यदि आप लैंडलाइन पर बात कर रहे हों, तो मोबाइल पर कॉल आ जाने पर आपकी बातचीत पर प्रभाव पड़ता है। डिस्टर्बेंस या मैग्नेटिक इंडक्शन जैसा असर पड़ता है। सत्संग का यही महत्त्व है। पुराने समय में करीब बीस साल पहले जो लोग म्यूजिक के शौक़ीन होते थे और जिन्होंने बड़े बड़े स्पीकर्स वाले सोनी जैसे महंगे म्यूजिक सिस्टम्स ले रखे थे उनको याद होगा की अक्सर म्यूजिक सिस्टम के स्पीकर्स और टीवी आस पास रखे जाने के कारण, अक्सर टीवी के स्क्रीन के कॉर्नर्स पर रंगीन धब्बे (Colour Patches) दिखाई देने लगते थे। जब TV सर्विसिंग का मैकेनिक आता था, तो पहली बात यही कहता था की आपने स्पीकर्स को टीवी के इतने पास रखा है, इसलिए ये कलर के धब्बे (Patches) कोनो में आ गए हैं। उसको ठीक करने के लिए वह एक मैगनेट लेकर TV स्क्रीन के चारों कॉर्नर्स पर बिलकुल इस अंदाज़ में घुमाता था जैसे गांव में लोग झाड़ फ़ूंक करके बीमारी या किसी बुरी छाया को दूर करने का दावा करते हुए तांत्रिक आदि बाबा लोग करते हैं। उसे साफ़ करने के बाद वह सख्त हिदायत भी देता था

कि दुबारा स्पीकर्स को TV स्क्रीन के इतने पास न रखें। यानि कुसंग से बचें। यह एक बहुत ही यूजर फ्रेंडली उदाहरण और अनुभव है की हम किस तरह के लोगों के आस पास रहते हैं। किस से मिलते जुलते हैं। किनके साथ खाते पीते हैं, वह सब हमारी आध्यात्मिक कोर को प्रभावित करते हैं और गलत प्रभाव को हटाने के लिए कुछ टीवी और स्पीकर्स जैसी ही Demagnetising की प्रक्रिया करनी पड़ती है। इसलिए इस बात का ख़ास ख़याल रखना चाहिए कि आपका कैसे लोगों के साथ उठना बैठना है, किस तरह के लोग आपके यहां आते जाते हैं, आप किस तरह के लोगों के साथ खाते पीते हैं और जिनके साथ खाते पीते हैं उनकी कमाई का ज़रिया पवित्र है या अपवित्र। कम से कम अपने बच्चों के बारे में अत्यंत सतर्क रहे, किसी भी अधर्मी और निम्न कोटि से जीवन यापन करने वाले से अपने बच्चों को न तो कोई उपहार ही लेने दें, न ही उनकी लाई कोई चॉकलेट या अन्य कोई खाद्य पदार्थ लेने दें, चाहें वह सीधे स्विट्ज़रलैंड से ही चॉकलेट क्यों न ला रहे हो। हाथ जोड़ कर क्षमा याचना कर लें क‍ि आप के बच्चों को बक्श दें। उन पर ऐसे लोगों की परछाईं तक न पड़ने दें।

प्रश्न: आपके अनुसार, इस श्रृंखला से, आप जो यह ज्ञान दे रहे है, क्या वह सबके लिए एक-सा सत्य है, सब पर सामान रूप से लागू होता हैं ?

शरणागत अजीत: आपका यह स्टेटमेंट क‍ि मैं कोई ज्ञान दे रहा हूं, यही गलत हैं। ज्ञान देने की मेरी कोई योग्यता नहीं हैं। आदमी एक जीवनकाल में स्वयं ही कुछ आध्यात्मिक अनुभव पा ले, खुद साक्षात्कार की झलक पा सके, उसी को परमकृपा मानना चाहिए। किसी दूसरे को ज्ञान देने की सोचना अपरिपक्वता और अज्ञानता के सिवा कुछ नहीं है। यह श्रृंखला अपने उन युवाओं के साथ सिर्फ अनुभव साझा करने का प्रयास है, जो इस दुविधा में पले बड़े हैं, जहां समाज में यह बताया गया है कि जो अंग्रेजी नहीं पढ़ सका उसका जीना ही व्यर्थ है। वह ज़िन्दगी में कुछ नहीं कर सकता और भारतीय होना और भारतीयता दोनों ही हीनता के सूचक हैं, और अपने धर्म और संस्कृति को गाली देना ही आधुनिकता का और आधुनिक कहलाने का पैमाना हैं।

यह श्रृंखला यह बताने का प्रयास है कि ईश्वर और अच्छाई की बात करनेवाला हर आदमी देहाती या गंवारपन का ब्रांड एम्बेसडर न होकर अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ खुले दिल और दिमाग वाला एक स्वाभिमानी स्वज्ञानी भी हो सकता है। और बिना इस बात कि चिंता किए क‍ि तथाकथित सफल और पढ़-लिखे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं या सोचेंगे। अपने शास्त्रों को पढ़ें, उन पर विद्वानों से चर्चा करें, मनन करें, अपने महान संतों के बारे में जानें और बिना हिचक के अपने सत्यों एवं अनुभवों को स्वयं अपने जीवन की प्रयोगशाला में परखें। दूसरों से अप्रूवल लेने के लिए याचना न करें। दूसरे का जाना और परखा सत्य, दूसरे पर ही लागू होता है, जब तक आपका सत्य, आपका अपना अनुभव नहीं बन जाता, तब तक वह सिर्फ एक कथन ही है, आपका सत्य नहीं है। सत्यों से प्रयोग सिर्फ गांधी जी का ही एकाअधिकार या विरासत नहीं था। हम सबको अपने अपने सत्यों के साथ अपने अपने छोटे छोटे प्रयोग करने का हक़ एवं अधिकार है।

प्रश्न: आज का सूत्र क्या होगा?

शरणागतअजीत: आज का सूत्र समझने के लिए यह समझना ज़रूरी है कि ‘ज्ञान और कर्म’, आत्मा रुपी पक्षी को, मानव जीवन रुपी यात्रा को पूरा करने के लिए आवश्यक दो पंख हैं। शास्त्र और तमाम किताबें पढ़कर कोरे ज्ञानी बन कर ज्ञान बांचने से कुछ हासिल नहीं होता है। न जाने कितने ज्ञानी आए, और कितने गए। ज्ञान का मतलब और सही इस्तेमाल जब है, जब मनुष्य उसे अपने रोज़मर्रा के जीवन में हर सांस के साथ जिए। उसका ज्ञान, कोरा किताबी ज्ञान न रह कर, उसके कर्मो को गाइड करने वाला, एक पथ प्रदर्शक, एक गूगल रूट मैप की तरह लगातार उसके हर कदम को गाइड करने वाला, एक जीपीएस की तरह का बिल्ट इन गाइड बन जाए। गलती होने पर रीरूट (Reroute) करने का ऑप्शन भी बताए और नया सही मार्ग दिखाए। ज्ञान और कर्म का समन्वय जब हो जाता है, तो आदमी भटकने से बच जाता है और उसके कर्म चिपकते नहीं हैं (Mind becomes a Non-Stick Mind)। इसलिए जीवन को साक्षी भाव में जिएं, बजाय हर समय यह लिस्ट बनाने के की क्या-क्या और मिलना चाहिए, या मिलना चाहिए था। यह सोचें क‍ि क्या क्या मिला है और उसमे से कितनी चीज़ें ऐसी मिली हैं, जिनकी न तो कभी कल्पना की थी, और न ही जिनकी सही मायनों में कम से कम इस जन्म में तो सुपात्रता ही अर्जित की हुयी प्रतीत होती है। कृतज्ञता के भाव (Attitude of Gratitude) में ज़्यादा से ज़्यादा समय रहना चाहिए। मन हमेशा ईश्वर की कृपा पर भाव विभोर रहना चाहिए।

इसलिए आज का सूत्र है:

‘हर समय का रोना, शिकायत, स्वयं यानि लक्ष्य से दूर ले जाएगी, आभार यानि कृतज्ञता का भाव, आपको स्वयं के और करीब लाएगा’ 

आज बस इतना ही

At HIS feet

, 🙏🙏🙏 नोट – पाठक अपनी क‍िसी भी तरह की ज‍िज्ञासा प्रश्‍न के माध्‍यम से शरणागत के सामने रख सकते हैं, ज‍िसका उत्‍तर वे हर अंक में देगें। आज से हर गुरूवार को हिंदी और रव‍िवार को अंग्रेजी में यह आलेख शृंखला चलेगी। इस पते पर सवाल भेजें : indiagroundreport@gmail.com

शरणागत अजीत लेखक IIT से शिक्षा के बाद सिविल सेवा में रहते हुये..उच्च प्रशासनिक पदों पर काम करते हुए  अध्यात्म का संधान करते रहे। ‘एप्लाइड स्प्रिचुअलिटी’ (Applied Spirituality) और ‘टेक्नोलोजों ऑफ स्प्रिचुअलिटी’ ( Technology of Spirituality) पर देश और दुनिया भर में वार्ताएं कीं। ‘अहम ब्रह्मास्मि- व्हेन नोड बिकम्स द सर्वर’ ( ‘अहम ब्रह्मास्मि- When Node becomes the Server) नामक पुस्तक की रचना की। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या से व्यथित होकर व्यक्तिगत क़दम उठाया और किसानों के बच्चों की देख-रेख का ज़िम्मा लिया।टाइम्स आफ इंडिया के ‘स्पीकिंग ट्री. इन’ पर अध्यात्म के विषयों पर ब्लाग भी लिखे हैं । आपके द्वारा दिया गया मैनेजमेंट शिक्षा एवं प्रैक्टिस पर नया concept: “Corporate Spiritual Responsibility “ Management Education के क्षेत्र में बहुत चर्चा एवं उत्सुकता का विषय बना हुआ है। बैंगलोर के दो Management Education Institutes ने अपने यहॉं ‘सेंटर फ़ार कारपोरेट स्परीचुअल रेस्पौन्सबिलिटी’ की स्थापना भी की है और इस विषय पर काम जारी है।’CSpR’ में आपकी परिकल्पना निम्न प्रकार है: 1. ‘व्यवस्था’ of any organisation depends on the ‘अवस्था’ of its Managers. 2. Quality of your ‘Being’ will decide the quality of your ‘Doing’. Hence, of your ’Living’.  इस विषय पर हम आगे के अंकों में विस्तार से चर्चा करेंगे। वर्तमान में युवा और बच्चों में अध्यात्म के बीज डालने के लिए तकनीकी का बख़ूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके लिए इंटरनेट इस सदी की सबसे बड़ी आध्यात्मिक खोज है।