Applied Spirituality for Pentium generation : प्रार्थना : ईश्वर को एक ‘मिस्ड कॉल’! भाग -32

जीवन का आध्‍यात्‍म से क‍िस तरह का जुड़ाव है और आध्‍यात्‍म कैसे जीवन को बेहतर मसकद दे सकता है। इन व‍िषयों पर चर्चा करते हुए आज शरणागत अजीत बता रहे हैं क‍ि आख‍िर कैसे हर इंसान सीधे परमात्‍मा से जुड़ा हुआ है और कैसे इस जुड़ाव को और गहरा और मजबूत बनाया जा सकता है…

प्रश्न: आपकी परिकल्पना कि अध्यात्म सूक्ष्म जगत की इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी (Spirituality is Information Technology  of the Subtle Dimension ) है, का निचोड़ बताएंगे हमारे युवा पाठकों के लिए?

शरणागत अजीत:  हां, इस नज़रिए से अध्यात्म को देखने और समझने के लिए, हम एक बार फिर, यहां संक्षेप में अपनी इस परिकल्पना के आधार, और उसके पीछे के Core Realizations को एक साथ Summarise करेंगे। हमें उन सारे सिद्धांतों को दोहराना होगा, जिनके आधार पर हमनें शुरू में ही अपनी निम्न परिकल्पनाएं परिभाषित की थीं:

(A). Applied Spirituality for Pentium Generation,

(B). Prayer- A Missed Call to God,

(C). Technology of Spirituality and

(D). “अह्म ब्रह्मास्मि” – ‘When Node becomes The Server’

We will have to quickly browse through some of the basics of our Hypotheses. Core Realizations that prompted this line of thought, are summed up below:

1.       अध्यात्म सूक्ष्म जगत की इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी है।

‘Spirituality is Information Technology of the subtle world’.

2.       इंटरनेट इस सदी की सबसे बड़ी आध्यात्मिक खोज है।

‘Internet is the greatest Spiritual Discovery of last century.’

3. सम्पूर्ण अस्तित्व (Existence) एक स्पीरिचुऑ  सिस्टम (Spirituo System ) है, और ‘इको सिस्टम’ (Eco System)  उसका सिर्फ एक ‘सब सेट’ (Subset)   मात्र है। सम्पूर्ण कायनात एक एक्वेरियम (Aquarium)  की तरह है, जिसमे स्पिरिट (Spirit) रुपी, यानि जिसे हम परमात्मा  कहते हैं, पानी भरा है। जिसमे हम सभी योनियों के प्राणी और अन्य जीवन रुप (Life Forms), रंग बिरंगी मछलियों की तरह तैरते रहते हैं। और इस स्पिरिट रुपी जल, और इस एक्वेरियम के बाहर, कोई अस्तित्व संभव नहीं है। बिलकुल वैसे ही, जैसे की आम एक्वेरियम (Aquarium ) के  बाहर निकाल दिए जाने पर, मछली का अस्तित्व संभव नहीं होता है।

‘There is a Spirituo System – encompassing all Creation, and it is like a huge aquarium filled with Spirit (Parmatman), in place of water, in which all that exists – whether visible or invisible, manifest or still unmanifest, and all the creatures-including humans, keep floating. And that, no existence is possible outside this Spirituo System. Eco System – as we know it, is only a subset of this Spirituo System’.

4. हम सब सृष्टि में अस्तित्व रखने वाले जीव, निर्जीव, पदार्थ, सब कुछ एक नेटवर्क का हिस्सा हैं, आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ठीक उसी तरह जैसे LAN या WAN में,  दूर-दूर तक फैले हुए कम्प्यूटर्स, एक दूसरे से नेटवर्क द्वारा जुड़े रहते हैं। यानि हम सभी जीवात्माएं, स्टैंड अलोन कम्प्यूटर्स (Stand alone computers) न होकर एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हैं। इसे एकात्म का भाव (Vision of Oneness) व एकत्व की भावना (Oneness of Entire Existence) के नाम से जाना जाता है  व अनुभव भी किया जा सकता है। इसी सम्पूर्ण सृष्टि की एकत्व की सच्चाई को अपने आप में महसूस कर पाने की अवस्था (Realisation of the Truth of Oneness of entire Existence),  को ही समाधि की अवस्था कहा गया है, और यही मानव जीवन का लक्ष्य है।

‘All that exists in the Creation, is interconnected with each other and everytnig else. We don’t exist seaparately and can’t remain unaffected by each other and larger Cosmos surrounding us – each entity influencing, and getting influenced, by each other (Reminds of Quantum Theory?). We are not ‘Standalone Computers’, but instead are part of a huge network – truly a ‘Cosmic Web’. This realization and vision of this Truth – this aspect of Reality, is called ‘Vision of Oneness’ and the phenomeneon demonstrates, ‘Interconnectedness of the entire Existence’. 

हमारा नाम, गोत्र, कुल देवी, जन्म नक्षत्र, और पृथ्वी पर पड़ाव की जगह – यानि ग्राम व देश आदि, यह सब हमारे आध्यात्मिक निर्देशांक (Spiritual Coordinates) हैं, और ठीक उसी तरह काम करते हैं, जैसे इंटरनेट टेक्नोलॉजी में TCP/IP Address, करता है, और जो TCP/IP Address का महत्त्व और रोल है।

‘That our Gotra, Family deity, Birth Nakshatra,  and other coordinates actually represent our Spiritual Coordinates – something equivalent of what is known as TCP/IP Address in the world of IT and Internet’.

जैसा क‍ि हमने देखा था कि शुरुआत में सबसे अच्छी आध्यात्मिक प्रक्रिया नाम जप या नाम स्मरण है। जो लोग नाम जप करते हैं और उसके बारे में जानते हैं, उनको मालूम है कि नाम जप या मंत्र जाप में होता यूं है कि कुछ समय के अभ्यास के बाद जपा जाने वाला मन्त्र या नाम आपके सिस्टम में स्वयं इनस्टॉल (Gets installed in your system)  हो जाता है, और वो नाम जप, आप के अनजाने में भी मन में चलता रहता  है, जिसे अजपा जप कहते हैं। जब भी आपका मन ख़ाली होता है, यह जपा जाने वाला नाम या मन्त्र अपने आप मन में तैरने लगता/तैरता (Starts floating on your Manas)  रहता है, बिलकुल उसी तरह जैसे क‍ि आपका कंप्यूटर का स्क्रीन Idle होने पर ‘Screen Saver’, स्क्रीन पर तैरने Float होने लगता है (Screen Saver starts floating on the Computer Screen)

इसीलिए यह समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए की नाम जप का महत्व वैसा ही है जैसा स्क्रीन Saver  का है।  यदि जपा जाने वाला  यह मन्त्र कोई जागृत मन्त्र हो और किसी जागृत सिद्ध गुरु से लिया गया हो तो यह मन्त्र न सिर्फ Screen Saver का कार्य करता है बल्कि एक एंटी वायरस (Anti Virus)  के रूप में भी काम करता है और आपके मन को वासनाओं द्वारा हैक (Hack) होने से भी सुरक्षा प्रदान करता है।  ऐसा ही मन्त्र जाप करने वाला मन्त्र जंक फ़िल्टर (Junk Filter) की तरह भी काम करता है और हर न ज़रूरी या भ्रष्ट करने वाले विचारों  को जंक फोल्डर (Junk Folder) की तरफ मोड़ देता है।  अब क्योंकि किसी भी एंटी वायरस सॉफ्टवेयर को समय समय पर Update करते रहना ज़रूरी होता है। इसीलिए यह कहते हैं क‍ि‍दिन में कम-से-कम एक बार ध्यान (Meditation)  के माध्यम से मन को उस ईश्वर रुपी  इनटरनेट (Internet ) से ज़रूर कनेक्ट कर के अपडेट कर लें। और दैविकता से आंतरिक सम्बन्ध, चाहे वह इष्ट देव के माध्यम से हो, गुरु के माध्यम से हो, या फिर स्वयं के संचित कर्मों के कारण बरसती कृपा के कारण सीधा ही हो, व्यक्ति के चारों तरफ एक फायर वाल जैस, सुरक्षा कवच  बना देता है। 

‘That chanting of a Mantra (मंत्र) has the same effect on our Mind (मानस पटल), as does a Screen Saver for the computer screen. And a Mantra which is chanted regularly for a prescribed length of time gets installed in our Manas as a ‘Screen Saver’. Also, if the Mantra is given by a Realised Master, and if it is an Activated Mantra (जागृत मंत्र), it also acts as an Anti Virus. And that, to keep an Anti Virus upto date, you need to connect to the internet frequently, and that is what daily Meditation does. In addition, if someone, is connected to his personal Inner Divine (ईष्ट देव), Divinity acts as a firewall around his Being.

ध्यान की प्रक्रिया और इंटरनेट में बहुत समानता है। जैसे की इंटरनेट के कनेक्ट हो जाने पर बाहर जाने वाले और रिसीव किये जाने वाले पैकेट्स (Packets Sent – Packets Received) को देखकर ही इंटरनेट की कनेक्टिविटी की दक्षता (Strength of the Connection )  का अनुमान लगाया जाता है, ठीक उसी तरह जब हम ध्यान में होते हैं, तो हमारा सृष्टि के साथ  एक तादात्म्य स्थापित होता है, और व्यक्ति और कॉसमॉस (Microcosm and Macrocosm) के बीच सिग्नल्स का संचार, और आदान प्रदान होता है। इसी तरह आज इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में होने वाली सभी खोज और अन्वेषण उन सत्यों को पदार्थ के स्तर (Level of Matter) पर एक बार फिर सत्यापित (Validate) कर रहे हैं, जो हमारे आध्यात्मिक ज्ञान (Ancient Spiritual Wisdom) में सदियों से मालूम हैं। जैसे कि बड़े संतों का एक ही समय में कई स्थानों  पर दर्शन देना या अचानक एक जगह से अंतर्ध्यान होकर दूसरी जगह प्रकट हो जाना, आज की ‘कॉपी-पेस्ट’ (Copy Paste)  व ‘कट –पेस्ट’ (Cut Paste) तकनीक के समतुल्य है।

ठीक इसी तरह भारत में ऐसे अनेक संत रहे हैं, और वर्तमान काल में भी हैं, जो विदेशी शिष्यों  से उनकी ही भाषा में धारा प्रवाह तरीके से बात चीत करते थे। यह सत्य आज ,आईटी के क्षेत्र में, एक नयी नायाब  खोज के रूप में   गूगल ट्रांसलेटर (Google Translator)  के नाम से ईज़ाद की गयी है। तात्पर्य यह है कि पदार्थ के स्तर पर भौतिक जगत में जो कुछ भी अन्वेषण या खोज हो रहीं हैं, उनका डिजिटल संस्करण (Digital Version), आध्यात्मिक या सूक्ष्म जगत में पहले से ही केवल मौजूद ही नहीं है, बल्कि हमारे आध्यात्मिक विरासत में पहले से ही ज्ञात है, और हमारे सिद्धों व संतों के लिए आम बात थी।

Meditation is a two way process, exactly like the exchange that takes place in an Internet Connection – measured and seen as ‘Packets Sent-Packets Received’. That all the current discoveries and developments, in the field of Software and IT, have their equivalent digitised version‘ already featuring’, in  our ancient Spiritual knowledge,  which were common knowledge in matters spiritual, during interactions by Spiritual Masters – in not too distant a past, and even today,  in cases of some very rare Masters. For example, spiritual Masters’ ability to be present at several places, and appear before their disciples in different geographical locations, simulatenously, is exactly like today’s operation of ‘Copy–Paste’. While being able to dissolve their physical presence and then appear elsewhere, was nothing except ‘Cut-Paste’ feature of today’s Software. And Realised Masters, conversing with their foreign disciples in their own, respective different foreign languages, is what is developed as ‘Google Translater’ today. Ability to plant one’s thought in another’s Mind was a technique similar to ‘Blue Tooth Technology’ of today. We also talked of future possibility of ‘Blue Tooth Conception’, where humans will be able to procreate – without having to indulge in Animal act of sexual intercourse, and instead the females will  be equipped and  able to conceive by mutually agreed transfer of relevant file from the male – through the ‘Bluetooth equivalent of Spiritual Pairing’, between the consenting man and woman.

कि जीवात्मा रुपी सिम कार्ड, शरीर रुपी हैंडसेट में ईश्वर के यहां से ही फैक्ट्री फिटेड आता है। जबकि मूल आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान, जिसे हम वैदिक ज्ञान के रूप में जानते हैं, मोबाइल, सेल फ़ोन टेक्नोलॉजी जैसी है, वहीं मानव द्वारा निर्मित अनेक धर्म, अलग अलग ब्रांड नेम्स (Brand Names) के सर्विस प्रोवाइडर हैं। और चाहे हम किसी भी सर्विस प्रोवाइडर को क्यों न सब्सक्राइब (Subscribe) करते हों, एक बार यह आत्मा रुपी सिम कार्ड एक्टिवेट हो गया तब उस आत्मा रुपी सिम कार्ड को ,कायनात से, ईश्वर से  लाइफ टाइम फ्री इन कमिंग कॉल, की जीवन भर फ्री सुविधा मिलती (The moment your SIM card gets activated, Incoming is life time free) है। हम उस life time free incoming कॉल की सुविधा का उपयोग कितना करते हैं, यह दूसरा ही विषय है।इसी सिलसिले में यह भी देखा था की दो सिम कार्डस का एक दूसरे से आदान प्रदान (SIM to SIM), सिर्फ उन दो सिम कार्ड्स तक ही सीमित नहीं होता है। बल्कि इसमें एक तीसरी डायमेंशन भी है जो है सिम से सर्वर (SIM to Server) का संचार। और यह खेल सिर्फ दो आत्माओं तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि यह हमारे सम्पूर्ण  स्पीरिचुऑ सिस्टम, Entire Conscience Collective को प्रभावित करता है।  इसीलिए जैसे लोग होंगे वैसे ही उस समाज की Conscience Collective होगी। और इसीलिए यह कहना बचपना है की विन विन (Win –Win) की फिलॉसोफी सबसे अच्छा सौदा है, और बाकि समाज का उससे कोई ताल्लुक नहीं है।

‘Also the factory fitted SIM card, called Soul or Jeeva, which comes in different sizes and shapes of bodily handsets, getting activated after following the set procedures and protocols provided by different Service Providers – we know as Religions. And the fact, of the Incoming Call becoming life time free – once the SIM gets activated.And with the activation of the SIM card (Soul), many features – like present day GPS also ‘get’ activated in the Being – ‘Navigating in Human Mode’.We have also seen, that the interaction between the two SIM cards, is not limited or confined only to these two SIMs interacting with each other, but there is another dimension of interaction that takes place simultaneously – that is between the SIM and the Server. How two individual souls interact with each other and what they do between them, has repurcussions which go far beyond those two individuals and affects the Conscience Collective of the Spirituo System in their zone of influence. Hence, the fallacy of the current day, management jargon of ‘WIN-WIN’ approach.

जैसा की हमारे वेदों के महावाक्यों से पता चलता है, और अनेकों अनेक संतों के व्यक्तिगत अनुभवों के उदाहरण हैं, कि जैसे ही सिद्ध पुरुष, समाधि की अवस्था में पहुँचते थे, उनका एक ही विस्मयादिबोधक अभिव्यक्ति (Exclamation) होती थी, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’। यह ठीक वही प्रक्रिया है जैसे जब आपका लैपटॉप इंटरनेट से कनेक्ट हो जाने पर एक प्लास्टिक का डिब्बा न रह जाकर, स्वयं सर्वर के समतुल्य हो जाता है (Your lap top on getting connected to Internet, becomes as powerful as the Server itself)। यदि लैपटॉप बोल सकता तो शायद् कुछ ऐसे exclaim  करता (‘I am The Server’)  ‘अहम् सर्वर अस्मि’।

‘And finally, the phenomenon of the ‘Node becoming the Server’, demonstrating the same phenomenon and reaching the same State where the ancient Rishis, when they reached the stage of Samadhi, inavariably described that state, by exclaiming ‘Aham Brahmasmi’. This is exactly like, if the Node could – on getting connected to the Internet, exclaim, ‘I am the Server’.’ 

सम्पूर्ण ‘Technolgy of Spirituality’ का विचार, ऊपर दिए गए इन मूल सिद्धांतों पर आधारित है।

 प्रश्न: आज का सूत्र क्या होगा?

शरणागत अजीत: अंतिम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है। जैसा हम पहले भी कई बार कह चुके हैं की शास्त्रों का ज्ञान,  ध्यान, प्राणायाम, अन्य साधनायें, सिर्फ साधन हैं। तैयारी के साधन हैं (Are only steps in preparation towards the goal of connecting with God)  उस मार्ग पर आगे बढ़ने के। यह सब JEE की कोचिंग करने के सामान हैं। डिग्री तब ही मिलेगी जब IIT में एडमिशन  हो जाये और वहां की चार वर्ष का पाठ्यक्रम (Both Academics and Extracurricular) सफलता पूर्वक पास न कर लें।यह सब आध्यात्मिक औज़ार और तकनीक (Spiritual Tools and Techniques)  सिर्फ हमें फाइनल घटना (Flowering of Heart) के लिए तैयार करने का साधन मात्र हैं। लक्ष्य उस घटना का घटित होना है जिससे हम स्वयं पिघल कर परमात्मा में लीन नहीं हो जाते हैं। वो घटना  जिसे हम स्वयं से साक्षात्कार कहते हैं। भगवान मिला ही हुआ है, हमें सिर्फ उसे पहचानना है, उसे प्रार्थनामय होकर पुकारना है,  डाउनलोड करना है। और प्रार्थना को न तो शास्त्रों की ही ज़रुरत है और न ही किसी भाषा की। उसके लिए सिर्फ प्रेम की ज़रुरत है, एक निष्पाप बालक जैसा प्रेम – अनन्य भाव के साथ, जैसा कि एक  शिशु अपनी मां के लिए रखता है।  सब कुछ तुम्हारे अंदर ही मौजूद है, सिर्फ एक चिंगारी चाहिए तुम को, स्वयं को Activate करने के लिए। वह घटना जिसे हम सिम कार्ड का एक्टिवेशन (Activation of the SIM card – The Jeeva within) कहते हैं।

‘तो अंततः यात्रा केवल स्वयं से स्वयं तक की ही है। वापस आना, पहुंचना अपने आप पर ही है, कितना घूम कर, कितना चक्कर लगाकर आते हो, यह तुम पर निर्भर करता है।अगर शास्त्रों के चक्कर में पड़ गए तो चक्कर बहुत लम्बा भी हो सकता है, और अड़चन भरा भी क्योंकि ज्ञान का मार्ग अपनी अलग अड़चने लेकर आता है जैसे ज्ञान के साथ आने वाला अहंकार और कर्ता भाव, की हम प्रयास से ईश्वर को प्राप्त करेंगे। ईश्वर प्रयास से नहीं प्रसाद में मिलता है। इसीलिए एक अच्छा और भरोसेमंद टूरिस्ट गाइड – जिसे आध्यात्मिक यात्रा के एडवेंचर में गुरु के नाम से जाना जाता है, ले लेने में ही अक्लमंदी है। सबसे आसान है प्रेम का मार्ग, भक्ति का मार्ग।  प्रेम ही वह अदृश्य धागा है, जो हमें ईश्वर से जोड़ता है’।

तो आज का सूत्र है:

‘परमात्मा, तुम क्या करते हो, इस से नहीं मिलता है, बल्कि तुम क्या हो, इससे मिलता है। इसलिए अध्यात्म को जियो, अपनी ज़िन्दगी में ढालो, और अपनी सुपात्रता बनाये रखते हुए, समर्पण के साथ, ईश्वर की भक्ति में लीन होकर, ‘भक्त से भगवान तक’ का सफर पूरा करो। ईश्वर का सतत स्मरण ही ईश्वर को प्राप्त करने की कुंजी है’। 

‘Constant remembrance of God is the Key’

आज बस इतना ही

At HIS feet,

🙏🙏🙏

नोट – पाठक अपनी क‍िसी भी तरह की ज‍िज्ञासा प्रश्‍न के माध्‍यम से शरणागत के सामने रख सकते हैं, ज‍िसका उत्‍तर वे हर अंक में देगें। आज से हर गुरूवार को हिंदी और रव‍िवार को अंग्रेजी में यह आलेख शृंखला चलेगी। इस पते पर सवाल भेजें : indiagroundreport@gmail.com

शरणागत अजीत लेखक IIT से शिक्षा के बाद सिविल सेवा में रहते हुये..उच्च प्रशासनिक पदों पर काम करते हुए  अध्यात्म का संधान करते रहे। ‘एप्लाइड स्प्रिचुअलिटी’ (Applied Spirituality) और ‘टेक्नोलोजों ऑफ स्प्रिचुअलिटी’ ( Technology of Spirituality) पर देश और दुनिया भर में वार्ताएं कीं। ‘अहम ब्रह्मास्मि- व्हेन नोड बिकम्स द सर्वर’ ( ‘अहम ब्रह्मास्मि- When Node becomes the Server) नामक पुस्तक की रचना की। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या से व्यथित होकर व्यक्तिगत क़दम उठाया और किसानों के बच्चों की देख-रेख का ज़िम्मा लिया।टाइम्स आफ इंडिया के ‘स्पीकिंग ट्री. इन’ पर अध्यात्म के विषयों पर ब्लाग भी लिखे हैं । आपके द्वारा दिया गया मैनेजमेंट शिक्षा एवं प्रैक्टिस पर नया concept: “Corporate Spiritual Responsibility “ Management Education के क्षेत्र में बहुत चर्चा एवं उत्सुकता का विषय बना हुआ है। बैंगलोर के दो Management Education Institutes ने अपने यहॉं ‘सेंटर फ़ार कारपोरेट स्परीचुअल रेस्पौन्सबिलिटी’ की स्थापना भी की है और इस विषय पर काम जारी है।’CSpR’ में आपकी परिकल्पना निम्न प्रकार है: 1. ‘व्यवस्था’ of any organisation depends on the ‘अवस्था’ of its Managers. 2. Quality of your ‘Being’ will decide the quality of your ‘Doing’. Hence, of your ’Living’.  इस विषय पर हम आगे के अंकों में विस्तार से चर्चा करेंगे। वर्तमान में युवा और बच्चों में अध्यात्म के बीज डालने के लिए तकनीकी का बख़ूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके लिए इंटरनेट इस सदी की सबसे बड़ी आध्यात्मिक खोज है।